Wednesday, March 13, 2013

जुम्मन का घर फिर क्यों जले...

फैजाबाद गयी तो टांडा गए बगैर रहा नहीं गया । फैजाबाद से करीब 45 किलोमीटर दूर बसे अंबेडकर नगर का एक कस्बा है, टांडा । लुंगी और गमछा के लिए प्रसिद्ध कस्बे में इन दिनों सांप्रदायिक तांडव चल रहा है । वैसे तो उत्तर प्रदेश के लिए सांप्रदायिक बलवा कुछ नयी बात नहीं है । लेकिन यह मामला कुछ हालिया है, और किस्मत से यहां जाने को भी मिल गया । सो देखने परखने को मिला कि आखिर कैसे दो खास समुदाय के लोग अचानक भिड़ जाते हैं। कैसे मरने औऱ मारने वाला इंसान से पहले हिंदू या मुसलमा हो जाता है ?नहीं-नहीं अचानक तो कुछ भी नहीं होता । हाल ही में मेरे दोस्त ने एक शेर सुनाया था, वक्त करता है परवरिश मुद्दतों, हादसा यक बा यक नहीं होता। । तो वाकई टांडा में भी जो हो रहा है या जो हुआ अकस्मात नहीं हुआ । इस कस्बे के मोहल्ले अलीगंज में बेहद रसूक वाले हिंदू युवा वाहिनी के जिला अध्यक्ष राम बाबू गुप्ता की हत्या तीन मार्च को कर दी गई । रामबाबू के घर का पता पूछने पर पास खड़े रिक्शे वाले ने कहा हंशराज वाले गुप्ता जी , जो अल्लाह को प्यारे हो गए। दरअसल हंशराज के नाम से उनका मेडिकल स्टोर है। मैंने कहा जी बिल्कुल वही । रिक्शे में बैठी तो चालक से कुछ जानने की गरज से पूछा आखिर हत्या क्यों कर दी गई। जी राजनीती का अंत तो मौत ही है। कुरेदने के लिहाज से मैंने फिर पूछा क्या ये हिंदू-मुस्लमान से जुड़ा मामला है। रिक्शे वाले का जवाब या यों कहें सवाल के जवाब में एक सवाल बेहद तीखा और मुझे चिढ़ाने वाला जैसा लगा। क्या इससे पहले इलाके में हत्या नहीं हुईं ? जिंदा रहते हैं तब भी लड़ाते हैं। और मरने के बाद वसीहत छोड़ जाते हैं अपने चमचों के नाम कि हमने बड़ी मुश्किल से संप्रदाय और धर्म का जहर देकर इस शहर को बर्बाद रखा है, उसे आगे भी आबाद न होने देने का जिम्मा तुम्हारा है। न मारने वाला राम का भक्त था न मारने वाला रहीम का । गुप्ता जी तो सात भाई हैं सो दबंगों सा दबदबा है । न होता तो एक हत्या के बदले इतने घर बर्बाद न कर देते। फिर हत्या तो किसी एक ने करवाई थी तो फिर इतने मुसलमानों का घर क्यों फूंक दिया ? रिक्शेवाले की बातें सुनते सुनते लगा शायद अदम गोंडवी ने भी एसे ही हालात के लिए लिखा होगा।..गर गल्तियां बाबर की थीं, तो जुम्मन का घर फिर क्यों जले/एसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िए । शायद यह संवाद औऱ चलता लेकिन इससे पहले ही घर घा आ गया। लोहे के चैनल लगे इस घर में लोगों का तांता लगा था। मैंने पहुंचकर अपना परिचय दिया। और उनके किसी सगे संबंधी से मिलने की इच्छा जताई । छोटे भाई श्याम बाबू ने बताना शुरू किया । टांडा के भीतर हिंदुओं में अगर कोई सशक्त परिवार है तो बस हमारा ही । मुसलमानों की हिम्मत नहीं पड़ती थी । हालांकि इस पूरे मोहल्ले अलीगंज में तीन ही घर हिंदुओं के हैं। इनमें से दो तो सीधे साधे गरीब लोग हैं । उनकी हिफाजत तो हम ही लोग करते हैं । हिंदुओं का दबदबा कायम था राम बाबू की वजह से । आंखों की किरकिरी बन गए थे ये, सो..ले ली जान । पीछे से एक आवाज आई कहते तो घूम रहे हैं कि सबसे मजबूत खंभा उखाड़ दिया। पीछे पलटकर मैंने जानना चाहा किसी खास व्यक्ति ने एसा कहा क्या, तो उन जनाब ने कहा, नहीं खबरें उड़ रही हैं। यानी कनबतिया हो रही हैं। या शायद राम बाबू को एक हिंदुत्व का एक मजबूत खम्भा मानने वाले लोगों का अपना विश्लेषण भी हो सकता है । जो भी हो...। मैंने फिर पूछा ये अचानक हुआ या फिर हाल में कुछ संकेत मिले थे आप लोगों को। नहीं ताक में तो ये लोग पहले से ही बैठे थे। 15 अगस्त 2012 को एक हिंदू लड़की को एक मुसलमान लड़के ने छेड़ दिया था। राम बाबू ने उसकी गिरफ्तारी के लिए मोर्चा खोल दिया था। 22 अगस्त को हजारों लोगों के साथ मिलकर प्रदर्शन किया। मजबूर होकर प्रशासन को हरकत में आना पड़ा। तब जाकर एफआईआर दर्ज हुई। इससे पहले भी इसी तरह का एक मसला 2010 का है। तब भी राम बाबू ही बीच में कूदे थे। आरोपी इस बार भी मुसलमान समुदाय का था। फिर उन्होंने बताया अयोध्या में जब मस्जिद गिरी थी, तब भी हजारों मुसलमानों ने हमारा ही घर घेरा था। कई और किस्से बताए। और फिर इन किस्सों का निचोड़ भी बताया कि दरअसल मुस्लिम समुदाय के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा हमारा ही परिवार है। श्याम बाबू खुद भी विश्व हिंदू परिषद के सदस्य हैं। उनकी बातें सुनते-सुनते मुझे रिक्शेवाले की बातें भी याद आ रही थीं। लगा राम बाबू श्याम बाबू के नाम वसीहत छोड़ गए हैं। वसीहत जिसमें लिखा है, अब इस संप्रदाय को जीवित रखने का जिम्मा तुम्हारा है। उन्हेंने रामबाबू बनाम अजीमुल हक यानी उस अंबेडकर नगर के मुस्लिम विधायक की लड़ाई को बड़े एहतियात से हिंदू बनाम मुस्लिम बना दिया था। नहीं तो सच ही तो है हत्याएं तो रोज ही होती हैं। उसी दिन के अखबार में पास के ही गांव में एक युवक की हत्या हुई थी। कसी ने नहीं पूछा था कि इस हिंदू युवको को किसने मारा ? क्या मुसलमान ने ? मैंने फिर पूछा पता चला है कि जिस दिन यानी तीन मार्च को रामबाबू की हत्या हुई। उसी दिन आधी रात को यहां से करीब 500 से 700 मीटर की दूरी पर बसी एक बस्ती धुरिया में कई घर हिंदू संगठन के लोगों ने जला दिए । उन्होंने इस आरोप से इनकार तो किया पर इकरार के साथ। हमने एसा कुछ नहीं किया। हम सबकुछ कानूनी प्रक्रिया से चाहते हैं। लेकिन दूसरे ही पल उन्होंने यह भी कहा किसी दल के नेता को मारकर यूं ही थोड़े बच जाओगे । उनकी पत्नी संजू देवी से मिली। रो-रोकर उनका बुरा हाल था। हलक से आवाज नहीं निकल रही थी। बमुश्रिकल 36-37साल की रही होंगी। बस एक ही बात वो दोहराई जा रही थीं कि हत्यारे को पकड़ा जाए। पहलवान ही है उनका हत्यारा। उसे सजा मिले। पहलवान यानी वहां का सपाई विधयाक अजीमुल हक। दुश्मनी की त्रासदी यही होती है कि असल दुश्मन से ज्यादा दुश्मन के चहेतों पर वार करती है । हर दुश्मनी की तरह इस दुश्मनी की परिणति भी यही हुई । यकीनन इसी तरह अयोध्या भी सांप्रदायिक हुई होगा । इसी तरह गुजरात ।

Tuesday, February 26, 2013

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/39639-2013-02-26-04-39-13

Wednesday, February 20, 2013

फांसी के सियासी मायनें!

मानवाधिकारों की रक्षा के लिए बनीं अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा बनाए गए दस्तावेज के आर्टिकल-5 के अनुसार ‘सजा के नाम पर किसी भी व्यक्ति के साथ क्रूर, अपमानजनक या अमानवीय या पीड़ादायक व्यवहार नहीं किया जा सकता है।’ फिर मौत की सजा तो सबसे ज्यादा क्रूर और अमानवीय व्यवहार है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए यह संस्था मौत की सजा का विरोध करती है। संस्था का यह भी तर्क है कि अपराधी को सजा देने से अपराध कम नहीं होता। इस संस्था ने भारत में पिछले तीन महीनों के भीतर दो अपराधियों को सजा देने पर विरोध जताया है। दुनियाभर के करीब 200 देशों में से 193 देश इस संस्था के सदस्य हैं। इससे जुड़े लगभग सभी देशों ने भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस तरह की सजा दिए जाने की आलोचना की है। इस संस्था के 96 सदस्य देशों में मौत की सजा पूरी तरह से खत्म की जा चुकी है। 34 देशों में इस मुद्दे को लेकर गंभीर चर्चा की जा रही है। ऐेसे में भारत में फांसी की सजा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर बवाल खड़ा कर दिया है। देश के भीतर भी कई सामाजिक संस्थाओं, वकीलों और न्यायाधीशों ने सरकार के इस फैसले की आलोचना की है। हाल ही में दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद जस्टिस वर्मा की कमेटी द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में भी साफतौर पर कहा गया था कि कहीं ऐसा प्रमाण नहीं मिलता कि मौत की सजा अपराधों को कम करने में मददगार साबित हुई हो। लेकिन सरकार ने फिर भी ऐसी स्थिति जहां बेहद क्रूर तरह से बलात्कार किया गया हो या बलात्कार के बाद इसका सामना करने वाली लड़की की हत्या कर दी गई हो। हड़बड़ी में लाए गए अपने अध्यादेश में इन दोनों ही परिस्थितियों में सरकार ने अपराधियों के लिए फांसी की सजा बनाए रखी है। यह रिपोर्ट कई महिला एवं अन्य सामाजिक संगठनों और देश के आम लोगों की राय के बाद बनाई गई थी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि देश में तीन महीनों के भीतर दो अपराधियों को फांसी की सजा क्यों दी गई है? अजमल कसाब मुंबई हमलों का मास्टर माइंड और अफजल गुरु संसद में हमला करने का दोषी था। चंदन की तस्करी करने वाले वीरप्पन के चार साथी भी इस लाईन में खड़े हैं। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने अभी इस पर रोक लगा दी है। कई राजनीतिक विशेषज्ञ इन दोनों ही सजाओं को 2014 में देश में होने वाले लोकसभा चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। अपने दोनों कार्यकालों (साल 2004 से लगातार केंद्र में) में भ्रष्टाचार, अपराधों और महंगाई पर लगाम लगाने में असफल रही सरकार ऐसा करके यह दिखाना चाहती है कि वह अपराधों को लेकर गंभीर है और न्याय व्यवस्था को सुधारने का दिखावा कर रही है। जिससे आम लोगों के वोट खींचे जा सकें।

Tuesday, January 29, 2013

हे राम! अयोध्या धाम

अयोध्या, क्या कहें! राम जन्मभूमि या विवादों की भूमि। राम बेघर, सीता रसोईं ठंडी पड़ी। बीस साल से। राम को दोबारा वनवास। पहली बार चैदह बरस। अबकी तो बीते दो दशक। मां ने भटकाया वन-वन। प्रजा ने छीना भवन अलीशान। दिया तंबू का अस्थायी आवास हे राम, नाम लेकर आपका। कर रहे संग्राम। अभी करो आप इंतजार। राम कसम, मंदिर वहीं बनाएंगे। राम लला, हाय अल्ला, बीते बीस साल। अब तो आप लल्ला से हो गए होंगे जवान आपके साथ है, शिवसेना, राम सेना और वानर सेना। गरीबों के लिए सरकार लगाती है, सर्दियों में रैन बसेरा। कुछ दिनों में आएगा फैसला, जरूर आएगा। हमारे हक में। क्या हुआ जो पहली बार तीन महीने की जगह 17 साल लगे। खर्च आया आठ करोड़। कितना भी हो बर्बाद। हजारों मरें। पर हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे। इंतजार और सही। देश की करीब 27 फीसदी जनता के सिर पर भी तो छत नहीं। फुटपाथ, झोपड़पट्टी, खानाबदोश जैसी जिंदगी गुजारते हैं, ताउम्र कई लोग। आपके लिए तो हमने दंगा कर दिया। खून बहा दिया। घर उजाड़ दिए। आपके साथ तो करोड़ों की जनता। पर, इनके साथ तो बस छल प्रपंच। गरीब को रोटी और छत तो मयस्सर नहीं। ऊपर से पड्यंत्र घनघोर। सरकार कर रही अनूठा प्रयास। बिना उन्नति, बिना विकास। गरीब को गरीब न रहने देने का प्रयास। क्या बात है, सरकार। रोज के तीस रूपए, बत्तीस रुपए। कमाई बढ़े न बढ़े। पर छू मंतर, लो आज से न कहना खुद को दरिद्र नारायण। क्योंकि, सरकार नहीं चाहती कि देश में कोई रहे गरीब या देश में रहे गरीब। मसला कुछ भी हो। सरकार तो सरकार। मानों ने मानों। आपको पता चले न चले। लो हो गए दस्तावेज तैयार। भई देश में न के बराबर बचे गरीब। छू...छू मंतर। महिमा अपार। चमत्कार। जादू। या बाजीगरी। खैर, इनकी छोड़ो। आप बेखौफ रहो। मस्त रहो। अपने तंबू में। हम तो मंदिर वहीं बनाएंगे। खामोश! अब तो आप चाहो न चाहो। चाहें रिरियाओ। सदियां बीत गईं। विवाद पर, और भी बीत जाएं। लेकिन......

Friday, December 28, 2012

सबक ले सरकार और प्रशासन

दिल्ली में धारा-144 लगाना। मैट्रो स्टेशन बंद करना। पुलिस की प्रदर्शनों को रोकने की गैरवाजबि कोशिश थी। जिन्हें प्रदर्शन करना था, उन्होंने किया। सरकार ने जितना दमनात्मक रवैया अपनाया, जनता उतनी ही बागी हुई। पूरे मामले पर नजर रख रहे और इस पर कार्रवाई की नीति बनाने वाले लोगों को घटना की वजह से लोकर उसके दूरगामी असर के बारे में गहराई से सोचना चाहिए था। जो कि नहीं किया गया। अगर मामले के स•ाी पहलुओं, पहले घट चुकी घटना, मौजूदा समय में घट रही और •ाविष्य में पड़ने वाले प्र•ााव के मद्देनजर यह फैसला लिया जाता तो शायद यह आंदोलन उतना उग्र नहीं होता जितना की हुआ। दूसरी और सबसे अहम बात है, देश की जनता के मिजाज को समझने की। स•ाी प्रदर्शन किसी संस्था, या फिर किसी संगठन के बैनर तले नहीं थे। यह आंदोलन आम जनता का था। ऐसे में लाजिमी है कि कई आवाजें निकलें। यानी लोग अलग-अलग मांग कर रहे थे। विरोध के अलग-अलग तरीके अपना रहे थे। इन मांगों और विरोध के पीछे छिपी •ाावना को समझना जरूरी था। एक वजह के लिए इतनी बड़ी संख्या में लोगों का इकट्ठा होना अपने आपमें आप में एक नया अनु•ाव है। प्रशासन को •ाी इस बात का अंदाज शायद ही रहा हो। क्योंकि घटना कोई नई नहीं थी। मान लिया गया है कि ऐसे हादसे घटते ही रहते हैं। सो इसी खास घटना के लिए ही क्यों इतना हो-हल्ला? जवाब बेहद मुश्किल है। क्योंकि इससे ज्यादा खतरनाक मामला था, मणिपुर की मनोरमा का। आपको याद होगा कि कैसे कुछ सेना के लोगों ने बेहद क्रूरता के साथ इसका बलात्कार किया था। उसकी लाश किसी अकेले इलाके में मिली थी। उसकी योनी में सोलह गोलियां दागी गई थीं। दूसरा ही ऐसा मामला है कि छत्तीसगढ़ की सोनी सूरी का। •ांवरी देवी मामला •ाी कुछ कम दहशत पैदा करने वाला नहीं है। लेलेकिन कुछ वजहें जो मुझे समझ में आईं। एक आम व्यक्ति के तौर पर और एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर। वो कुछ इस तरह से हैं। -यह घटना दिल्ली के •ाीड़-•ााड़ वाले इलाके मुनीरका में हुई। - उसके साथ जो लड़का था, वो लोगों की पहचान करने में सक्षम था। -लड़की •ाी गं•ाीर स्थिति में थी लेकिन जब •ाी होश आया उसने दोषियों को सजा दिलाने की मांग की। यानी इस मामले को मुद्दा बनाने के पीछे लड़की की दृढ़ इच्छा शक्ति •ाी थी। -और एक बात जो इस मामले को तूल देने अहम रही वह यह कि मीडिया का खुला सपोर्ट मिला। जैसे-जेसिका लाल हत्याकांड में मिला था। -रिपोर्टिंग इस तरह से की गई कि लोगों के संवेदना के स्तर पर जाया जा सके। - कुछ हेडलाइंस-पापा मैं जीना चाहती हूं। उन्हें सजा मिली या नहीं। आई वांट टू अलाइव एंड फाइट बैक। इस मामले पर मीडिया की लेखन शैली और ले आउट। एक शोध का विषय •ाी हो सकता है। -नर्सिंग की छात्रा थी। इस मामले में डाक्टर •ाी ज्यादा संवेदनशील लगे। मुद्दा बनाने के पीछे ये •ाी एक अहम वजह थी। कुछ लोग कह रहे हैं- -मामला क्योंकि दिल्ली में घटा। इसलिए बड़ा मुद्दा बना। -लड़की मध्यवर्गी परिवार की थी। इसलिए इसे तूल मिली। -लड़की दलित नहीं नहीं थी, सवर्ण थी। क्योंकि दलित लड़कियों के साथ तो अक्सर यह घटता है। उन्हें क्यों नहीं तूल मिलती है। तो दिल्ली सिवाए इसके और •ाी कई मामले आए हैं। सबसे हालिया मामला 26 दिसंबर का है जिसमें 42 साल की औरत का रेप हुआ। इस घटना के कुछ दिन पहले ही तुर्कमान गेट में एक सात साल की बच्ची से रेप हुआ। और •ाी कई मामले हैं। यहां सूची डालना मेरा मकसद नहीं है। सो इसे लंबा नहीं करूंगी। दूसरा मध्यवर्गीय परिवार से थी। लोग इस वजह से अंदाजा लगा पा रहे हैं क्योेंकि वह नर्सिंग की छात्रा थी। तो किसी को क्या पता कि उसे पढ़ाने के लिए शिक्षा के लिए लोन लिया गया हो। या फिर खेत बेचे गए हों। या जैसे-तैसे जुगाड़कर करके मां बाप ने यहां तक •ोजा हो। इसलिए कई लोग जो ऐसे सवाल खड़े कर रहे हैं उन्हें नहीं पता कि इस लड़की की पृष्ठ•ाूमि क्या है? वह किस जाति की है। सो जैसे कुछ शब्द राजनीतिक-प्रशासनिक शब्दावली में शामिल हो गए हैं वैसे ही कुछ शब्द ऐसे तरह के मामलों में •ाी बोले जाते हैं। जैसे-हम •ारोसा दिलाते हैं जल्द न्याय मिलेगा। कार्रवाई चल रही है। घटना शर्मनाक, दखद। वगैरहा, वगैरहा। वैसे ही कुछ संगठन ऐसे सवाल परंपरा के तौर पर उठाते हैं। लेकिन सवाल जायज हैं या नाजायज इन्हें परखने और उनका सामाजिक-राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने की •ाी जरूरत है। और इन सवालों का क्यों न बेहतर और सधा हुआ जवाब •ाी दिया जाए। इस पूरे मामले से बस मैं एक ही बात कहना चाहती हूं। इसे आगे के लिए केस स्टडी के तौर पर इस्तेमाल करें। सरकार,प्रशासन सबक के तौर पर ले। जनता के मिजाज को समझे। प्रदर्शन, विरोधों का शमन (यानी उसके कारणों को खोज कर उनका निदान करना) किया जाए न कि दमन (बलपूर्वक दबाया जाए)। और जनता •ाी सबक ले कि प्रदर्शन को असरदायक और दूरगामी बनाने के लिए उसे क्या करना चाहिए। मैं फिर कहूंगी। इस पूरे मामले में सबसे अच्छी बात यह रही कि यह किसी संस्था,संगठन से प्रेरित नहीं बल्कि स्वत:स्फूर्त था।

Thursday, December 27, 2012

हैरान हूं मैं

हैरान हूं कि तुम हैरान नहीं हो /गुस्सा हूं कि तुम्हें गुस्सा नहीं आता/ बौखलाई हूं कि तुम बौखलाए क्यों नहीं हूं / क्योंकि बलात्कार के बाद •ाी मैं जिंदा हूं /पर, क्या केवल मैं ही जिंदा हूं?

Friday, December 21, 2012

...ताकि आगे इतना दर्द न मिले

मुझे किसी ने बताया कि लड़की ने लिखकर पूछा कि क्या उन्हें सजा हुई। (यह वही लड़की है जिसके लिए 16 दिसंबर की रात •ाारी गुजरी) दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में मौत और जिंदगी के बीच झूल लड़की का यह सवाल जिसका जवाब हमें नहीं पता। क्योंकि हम नहीं जानते कि उन्हें सजा होगी या नहीं। होगी •ाी तो कितनी? क्या उस सजा से उस लड़की को तसल्ली मिलेगी? लड़की को मिली तकलीफ और उन लड़कों को मिली सजा में क्या बराबरी होगी? नहीं जानते। अचानक सोचा कि चलो दोनों की तुलना कर लें। सब साफ हो जाएगा। लड़की तो बोल नहीं सकती या झूठ •ाी बोल सकती है। डाक्टर से पूछकर सब साफ कर लेते हैं। तो आज डाक्टर ने बताया। लड़की गं•ाीर है। हम कोशिश कर रहे हैं कि वो बच जाए। लड़की •ाी जीना चाहती है। उसने ऐसा लिखकर बताया है। पर, अगर वो जी •ाी गई तो वह पूरी जिंदगी खाना मुंह से नहीं खा पाएगी। उसे पूरी जिंदगी नसों के जरिए खाना देना पड़ेगा। तो क्या, खाना तो खाती रहेगी। पर सबसे बड़ी बात तो यह है कि नसों के जरिए खाना देने पर हमेशा संक्रमण होने का डर रहेगा। और जो विटामिन और दवाएं पूरी जिंदगी के लिए चाहिए वो कतई सस्ते नहीं हैं। दूसरा इस लड़की को शार्ट सिंड्रोम नाम की बीमारी होने के •ाी आसार हैं। वो क्या? इस बीमारी में कुछ खाते ही फौरन शौच के लिए जाना पड़ता है। पर ऐसा क्या हुआ। बलात्कार के समय जब लड़की ने विरोध किया तो उन लोगों ने इसके पेट में लोहे की सरिया घुसा दी। जिससे इसकी छोटी आंत बुरी तरह जख्मी हो गई थी। इसलिए उसे निकालना पड़ा। और ये जो सारी दिक्कतें हैं, छोटी आंत न होने की वजह से हैं। ऐसी जिंदगी। यानी जब उसे नसों के जरिए पोषण दिया जाएगा। हर बार उसके दिमाग में वह हादसा जरूर घूमेगा। ऐसा ही तो होता है। जब कुछ गलत घटता है तो हम उन सारी चीजों को अवाइड करते हैं। जो उस हादसे से जुड़ी हों। लेकिन वो तो चाहकर •ाी ऐसा नहीं कर पाएगी। डाक्टर ने फिर कुछ बोलने के लिए जैसे ही अपने होंठ खोले। लगा अ•ाी •ाी बाकी है, क्या? अब इसके मां बनने में •ाी कई कठिनाईयां पैदा होंगी। इसके जननांग •ाी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। और आंत के जख्मी होने का असर •ाी इस पर पड़ेगा। अगर मां बन •ाी गई तो...बच्चा बचना बेहद मुश्किल होगा। लड़की की हालत और उसके दर्द का हिसाब किस सजा से मिलेगा? उन्हें फांसी देने से..। उनका बधियाकरण करने से। उन्हें •ाीड़ के हवाले करने से। कैसे? क्योंकि किसी •ाी सजा में उतना दर्द नहीं है, जितना उस लड़की के हिस्से आ गया है। लेकिन सजा तो जरूरी है। सख्त से सख्त। जिससे कम से कम लोग ऐसा करने से पहले सोचें। आगे किसी लड़की, बच्ची या औरत को इतना दर्द न मिले। अब और नहीं। सहानु•ाूति नहीं न्याय चाहिए।