Friday, December 21, 2012

...ताकि आगे इतना दर्द न मिले

मुझे किसी ने बताया कि लड़की ने लिखकर पूछा कि क्या उन्हें सजा हुई। (यह वही लड़की है जिसके लिए 16 दिसंबर की रात •ाारी गुजरी) दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में मौत और जिंदगी के बीच झूल लड़की का यह सवाल जिसका जवाब हमें नहीं पता। क्योंकि हम नहीं जानते कि उन्हें सजा होगी या नहीं। होगी •ाी तो कितनी? क्या उस सजा से उस लड़की को तसल्ली मिलेगी? लड़की को मिली तकलीफ और उन लड़कों को मिली सजा में क्या बराबरी होगी? नहीं जानते। अचानक सोचा कि चलो दोनों की तुलना कर लें। सब साफ हो जाएगा। लड़की तो बोल नहीं सकती या झूठ •ाी बोल सकती है। डाक्टर से पूछकर सब साफ कर लेते हैं। तो आज डाक्टर ने बताया। लड़की गं•ाीर है। हम कोशिश कर रहे हैं कि वो बच जाए। लड़की •ाी जीना चाहती है। उसने ऐसा लिखकर बताया है। पर, अगर वो जी •ाी गई तो वह पूरी जिंदगी खाना मुंह से नहीं खा पाएगी। उसे पूरी जिंदगी नसों के जरिए खाना देना पड़ेगा। तो क्या, खाना तो खाती रहेगी। पर सबसे बड़ी बात तो यह है कि नसों के जरिए खाना देने पर हमेशा संक्रमण होने का डर रहेगा। और जो विटामिन और दवाएं पूरी जिंदगी के लिए चाहिए वो कतई सस्ते नहीं हैं। दूसरा इस लड़की को शार्ट सिंड्रोम नाम की बीमारी होने के •ाी आसार हैं। वो क्या? इस बीमारी में कुछ खाते ही फौरन शौच के लिए जाना पड़ता है। पर ऐसा क्या हुआ। बलात्कार के समय जब लड़की ने विरोध किया तो उन लोगों ने इसके पेट में लोहे की सरिया घुसा दी। जिससे इसकी छोटी आंत बुरी तरह जख्मी हो गई थी। इसलिए उसे निकालना पड़ा। और ये जो सारी दिक्कतें हैं, छोटी आंत न होने की वजह से हैं। ऐसी जिंदगी। यानी जब उसे नसों के जरिए पोषण दिया जाएगा। हर बार उसके दिमाग में वह हादसा जरूर घूमेगा। ऐसा ही तो होता है। जब कुछ गलत घटता है तो हम उन सारी चीजों को अवाइड करते हैं। जो उस हादसे से जुड़ी हों। लेकिन वो तो चाहकर •ाी ऐसा नहीं कर पाएगी। डाक्टर ने फिर कुछ बोलने के लिए जैसे ही अपने होंठ खोले। लगा अ•ाी •ाी बाकी है, क्या? अब इसके मां बनने में •ाी कई कठिनाईयां पैदा होंगी। इसके जननांग •ाी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। और आंत के जख्मी होने का असर •ाी इस पर पड़ेगा। अगर मां बन •ाी गई तो...बच्चा बचना बेहद मुश्किल होगा। लड़की की हालत और उसके दर्द का हिसाब किस सजा से मिलेगा? उन्हें फांसी देने से..। उनका बधियाकरण करने से। उन्हें •ाीड़ के हवाले करने से। कैसे? क्योंकि किसी •ाी सजा में उतना दर्द नहीं है, जितना उस लड़की के हिस्से आ गया है। लेकिन सजा तो जरूरी है। सख्त से सख्त। जिससे कम से कम लोग ऐसा करने से पहले सोचें। आगे किसी लड़की, बच्ची या औरत को इतना दर्द न मिले। अब और नहीं। सहानु•ाूति नहीं न्याय चाहिए।

Tuesday, November 27, 2012

कहां से लाई छुड़ौती

ह्यपति का छोडे का चाहित हव। लेकिन पैसवा नहीं हव। तब्बैं हम ई जिंदगी जिए का मजबूर हवह्ण। बनारस के चोलापुर ब्लाक, बेलापुर गांव की प्रियंका की यह बात सुनने में ले ही अजीब लगे। लेकिन यह सच है कि बिना छुड़ौती की रकम दिए वह अपने पति को नहीं छोड़ सकती है। चाहें वह अपनी शादी से खुश हो या नहीं। छुड़ौती उस रकम को बोला जाता है जो एक पक्ष दूसरे को अदा करता है। छुड़ौती ग्रामीण बनारस की प्रचलित प्रथा है। इस प्रथा के मुताबिक पति-पत्नी में से कोई एक अगर दूसरे को छोड़ना चाहे तो उसे कुछ रकम अदा करनी पड़ती है। यहां के गांवों में खासकर दलितों में यह प्रथा खासी प्रचलित है। तलाक लेने के लिए कानून का दरवाजा खटखटाना पंचायत की तौहीन मानी जाती है। ऐसे में पंचायतें ही पति-पत्नी के विवाद निपटाती हैं। पति या पत्नी किसी एक या फिर दोनों की गुहार के बाद पंचायत लगती है। सरपंच के सामने दोनों अपनी-अपनी बात रखते हैं। उसके बाद सरपंच पूछता है कि कौन किसको छोड़ना चाहता है। ऐसे में अगर पति कहता है कि वह पत्नी को छोड़ना चाहता है, तो पत्नी के पक्ष वाले रकम की मांग करते हैं। इसके उलट पत्नी छोड़ना चाहे तो पति रकम की मांग करता है। इसकी खास बात यह है गलती किसी की ी हो, लेकिन छोड़ने वाले को ही रकम चुकानी पड़ती है। बनारस के कैंट रेलवे स्टेशन से करीब 35 किलोमीटर दूर बरबसपुर में प्रियंका अपनी चाची सास के पास रहती है। इक्कीस साल की प्रियंका दलित परिवार से है। प्रियंका अपनी आप बीती कुछ ऐसे बताती हैं। चैदह बरस की रहली तब्बैं शादी हो गईल। तब पता न रहल की पति कम दीमाग हव। पियत-खात तो शुरुवै से रहले। लेकिन अब सात साल बीत गईल। का करि, कुछौ समझ मा नहीं आत हव। प्रियंका का मायका गहनी गांव कैंट से करीब सात-आठ किलोमीटर दूर आजमगढ़ रोड पर है। उसके मां-बाप भी किसी तरह से उसका पीछा उसके पति से छुड़ाना चाहते हैं। लेकिन वो बेबस हैं। प्रियंका ने बताया कि उसका पति उसे छोड़ने को राजी नहीं है। हालांकि बीस-बीस दिन तक उसका पति गप्पू उसकी खैर-खबर तक नहीं लेता। पति, सास-ससुर, जेठ-जेठानी सब थोड़ी ही दूर पर पहाड़िया गांव में रहते हैं। पहले प्रियंका भी वहीं रहती थी लेकिन वहां पर पति के रंग-ढंग ठीक नहीं थे। प्रियंका ही नहीं आस-पड़ोस के लोगों का भी कहना है कि उसके पति का किसी दूसरी औरत से संबंध है। उसके मंगलसूत्र और नाक की नथ वह पहले ही बेच चुका है। ऐसे में वह अपनी चाची सास के साथ इस आस में रहने लगी की शायद दूर रहने पर उसे उसकी याद आए। लेकिन हालात जस के तस हैं। आठवीं पास करके वह ससुराल आई थी। अब वह बीए का पहला सा पूरा कर चुकी है। मायके वालों ने जैसे-तैसे उसे पढ़ाया। पति पांचवी पास है। हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। दोनों के बीच पति-पत्नी जैसा कोई संबंध नहीं है। उकताहट भारी आवाज में प्रियंका ने बताया कि महीनों हो जाते हैं गप्पू को देखे हुए। वह आता भी है तो बस बाहर-बाहर ही चला जाता है। कभी नहीं पूछता की क्या खाती हो। कैसे चूल्हा जलता है। मैं कुछ बोलूं तो बस मारने दौड़ता है। अभी तो उम्र है सो दूसरी शादी भी हो जाएगी। सात साल इंतजार किया अब अगर कोई कदम नहीं उठाया तो जिंदगी कैसे कटेगी। प्रियंका की मां पुष्पा ने बताया कि हम भी पल्ला छुड़ाना चाहते हैं। लेकिन सूझ नहीं रहा क्या करें। अगर पंचायत हमने बैठाई तो हमसे रकम की मांग होगी। कहां से लाएंगे। चार बेटियां हैं। दो की शादी किसी तरह की। अभी भी दो बची हैं। हम दोनों पति-पत्नी मजदूरी करते हैं। किसी तरह दो वक्त की रोटी जुगाड़ पाते हैं। पूछने पर उन्होंने बताया कि कम से कम सत्तर-अस्सी हजार की मांग होगी। पति गप्पू से पूछो तो साफ कह देता है। मैं अपनी तरफ से उसे नहीं छोड़ूंगा। वह चाहे तो छोड़ दे। पंचायत बैठकर हमारा फैसला कर दे। छुड़ौती देकर वह जहां चाहे जा सकती है। लड़की के ससुर लौटू भी गप्पू की हां में हां मिला रहे हैं। उनका कहना है कि बहू को चाहिए कि वह अपने पति के साथ रहे। साथ रहेगी तो वह किसी दूसरी औरत को नहीं ताकेगा। मर्द की जात है, सो उसे कुछ तो मन बहलाने को चाहिए ही। सो अगर पत्नी नहीं रहेगी तो इधर-उधर मुंह मारेगा ही। इस सवाल पर की अगर दोनों की पटती नहीं तो अलग क्यों नहीं हो जाते ये लोग। उनका भी जवाब गप्पू जैसा ही था। हम तो नहीं अलग होना चाहते। पर, प्रियंका होना चाहे तो। पंचायत करा ले। प्रियंका और उसके घरवालों को यह सलाह भी मिली कि वह कानून का दरवाजा खटखटाए। लेकिन ऐसा करना पंचायत की अवमानना होगी। छुड़ौती की रकम अगर पति अदा करता है तो वह पत्नी पक्ष से मिली दहेज के बराबर होती है। लेकिन पति किस रकम की मांग करता है?

Monday, October 29, 2012

दलित औरतों पर दोहरी मार हरियाणा में हिसार के डाबरा गांव में इन दिनों सन्नाटा पसरा है। यहां के एक दलित परिवार के मुखिया कृष्णा ने अपनी बेटी के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद अपनी जान दे दी। यह मामला अभी सुलझा भी नहीं था कि करीब के दूसरे गांव में अगड़ी जातियों के कुछ दबंगों ने तीस वर्षीय दलित महिला के घर में घुसकर दिनदहाड़े उसका बलात्कार किया। दिल्ली से सटे हुए हरियाणा में दलित महिलाओं के साथ इस तरह की घटनाएं हो रहीं हैं तो शहर से दूर ग्रामीण इलाकों में क्या हो रहा होगा इसका अंदाजा खुद ही लग जाता है? दोनों घटनाएं एक ही महीने के भीतर बेहद कम अंतर में घटी तो देश की राजधानी दिल्ली तक खलबली मच गई। लेकिन इसी बीच उत्तर प्रदेश के सीतापुर में भुदावां के पिसांवा गांव में दो औरतों का भी बलात्कार हुआ। दोनों औरतें दलित थीं लेकिन मामला इतना चर्चित नहीं हुआ, शायद इसकी वजह इस गांव का शहर से दूरदराज किसी कोने में बसे होना है।सभी मामलों में आरोपी उच्च जातियों के हैं। ये घटनाएं तो वो हैं जो जैसे-तैसे हम तक पहुंच गईं। लेकिन ज्यादातर मामले तो दबकर ही रह जाते हैं। महिलाएं और दलित दोनों ही समाज में अलग-थलग पड़े समुदाय हैं। केवल औरतों की बात करें तो समाज में इन्हें दूसरा दर्जा ही मिला है। आंकड़े भी यही कहते हैं, महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर रही एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘थॉमसन रायटर्स ट्रस्ट लॉ’ की इसी वर्ष आई रिपोर्ट की मानें तो पिछले साल देश में चौबीस हजार दो सौ छह बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे। इसी रिपोर्ट में दूसरा चौंकाने वाला आंकड़ा है कि जहां एक तरफ देश में स भी तरह के अपराध हर साल 16 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं वहीं महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले 31 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं। दोनों ही रिपोर्टों को जोड़कर देखें तो ‘दलित उस पर भी महिला’ होने की तस्वीर स्पष्ट होती है। जरा बात करें दलितों के लिए बने कानून की, तो 1989 में ही एससी/एसटी,अत्याचार निरोधक कानून बनाया जा चुका है। जिसमें दलितों के साथ किसी भी तरह के भेदभाव और अत्याचार करने वालों के लिए कठोर सजा तय की गई है। इसमें भी ‘दलित महिलाओं को सम्मान से जीने और सुरक्षा के अधिकार’ में रुकावट पैदा करने वाले पर अलग से कानूनी कार्रवाई करने का स्पष्ट आदेश है। इतने गं भीर मामलों में पंचायतों की क्या भूमिका यह देखना भी जरूरी है। ग्रामीण जनता के सबसे करीब प्रशासन की इकाई की बात करें तो वो हैं पंचायतें। कानूनी तौर पर पंचयातों के लिए स्पष्ट आदेश है कि गांव में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा और उनके सम्मान से जीने के अधिकार की रक्षा करना पंचायत की ही जिम्मेदारी है। लेकिन असल में पंचायतें उच्च जातियों के हाथों की कठपुतली हैं। हिसार के डाबरा गांव में दलित लड़की के साथ हुए बलात्कार के मामले को लड़की के बाप ने सबसे पहले पंचायत में ही उठाया था। लेकिन वहां से मदद मिलने की बजाए, झिड़की और चुप बैठने की सलाह मिली। नतीजा सबके सामने है। निराशा से घिरे बाप ने मौत को गले लगा लिया। बलात्कार, फिर बाप की मौत से लड़की ही नहीं पूरा दलित समुदाय दहशत में है।
अंधेरे को रोषनी का इंतजार ‘‘हमार पुरवा मा कब उजियारा होई ?’’ लगभग अधेड़ हो चुके उत्तर प्रदेष के जिला चित्रकूट के भभई गांव में चुनकी का पुरवा के मुन्नी लाल का सवाल दरअसल अधिकतर ग्रामीण आबादी का है। सरकारी आंकड़े भी देष की इस अंधेरी तस्वीर के गवाह हंै। 2011 की जनगणना के मुताबिक तकरीबन 55 प्रतिषत गांवों में बत्ती नहीं पहुंची है। देष की करीब सत्तर प्रतिषत आबादी गांवों में बसती है। और आज भी देहातों के आधे से ज्यादा घरों में कैरोसिन का दिया जलता है। मार्च, 2005 में षुरू हुई राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत पांच सालों के भीतर सौ प्रतिषत गांवों को रोषन करने की योजना बनाई गई थी। मजेदार बात यह है कि हम इसके कागजी आंकड़े भी नहीं जुटा पाए। इस योजना की सबसे बड़ी खासियत गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) और पिछड़ी जाति के लोगों को मुफ्त बिजली देना था। लेकिन इस मोर्चे पर तो हम नाकाम ही रहे। क्योंकि जिन गांवों में बिजली पहुंच भी गई है वहां की अधिकतर दलित बस्तियां अंधेरे में ही हैं। उत्तर प्रदेष के महोबा के रैपुरा कलां, छानी कलां बनारस के मेहदीगंज की मुसहर बस्ती, धरसौना, की दलित बस्ती। सूची लंबी है। कहीं खंभे हैं तो कहीं खंभे भी नहीं है। असल में सरकारी आंकड़ों में खंभे गाड़ने भर से मान लिया जाता है कि बिजली पहुंच गई है। ऐसे में बिजलीकरण से ज्यादा योजना खंभाकरण की लगती है। यानी सरकारी आंकड़ों की जमीनी स्तर पर पड़ताल करें तो यहां अंधेरा नहीं बल्कि घुप अंधेरा नजर आएगा। ये तस्वीर केवल उत्तर प्रेदेष की नहीं बल्कि देष के सभी गांवों की है। तीस जुलाई को देष के 19 राज्यों में अचानक एक साथ बिजली चली गई। इनमें से अधिकांष इलाके षहरी थे सो जमकर हो - हल्ला कटा। प्रदर्षन हुए, तोड़फोड़ हुई। सरकार हरकत में आ गई और कुछ घंटों में ही संकट खत्म हो गया। सोचो कुछ घंटों का अंधेरा षहरी जनता को बेचैन कर गया तो फिर गांवों में छाया लंबे समय से घुप अंधेरा क्या उन्हें काटने को नहीं दौड़ता होगा ?

Monday, July 30, 2012

तिवारी जी,

एन डी तिवारी बधाई हो आप बाप बन गए। आपको तो रोहित का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने 87 वर्ष की उम्र में पिता होने का एहसास करवाया। बाप बनाम बेटे की लड़ाई से एक बात तो साफ हो गई कि बाप एक नंबरी तो बेटा दस नंबरी निकला। जिद्दी बेटे ने गुरुर से भरे बाप को झुका ही दिया। हालांकि इस पूरे ड्रामें एक बात जिस पर किसी का ध्यान नहीं गया वह यह कि एक बेटे ने अपनी मां का साथ ऐसे मामले में दिया जिसे अक्सर हमारे समाज में कलंक कहा जाता है। बहुत खड़ी भाषा में बोलें तो ऐसी औरत के लिए लोग अक्सर कह देते हैं कि जवानी में रंगरलियां मनाईं हैं तो अब भुगतो नतीजा। अक्सर ऐसी मां के बेटे भी अपनी मां को हो दोषी मानते हैं लेकिन यहां रोहित ने अपनी मां को इंसाफ दिलाया। एक ऐसे व्यक्ति को कठघरे में खड़ा कर दिया जो राजनीति में मजबूती के साथ स्थापित था। इस पूरी लड़ाई के दौरान रोहित को क्या-कुछ नहीं सहना पड़ा होगा? ये बताने की जरूरत नहीं है। परिवार, दोस्तों और समाज से उसे कई तरह के ताने मिले होंगे। हालांकि अगर ढूढ़ां जाए तो ऐसी कई कद्द्दावर शख्सियतें होंगी जो कई बेटे-बेटियों के जैविक पिता या हो सकता है कि ऐसी मांएं भी हों। लेकिन उनके खिलाफ लड़ने की हिम्मत किसी में भी नहीं होती। उज्जवला को फक्र होगा कि उसने रोहित को पैदा किया। तिवारी जी गुस्सा तो बहुत आ रहा होगा। लेकिन आप कर भी क्या सकते हैं निगोड़ी विज्ञान ने आपका भांडाफोड़ कर दिया। पर अब इतनी छीछालेथन के बाद जब आप बाप बन ही गए हैं तो सरेआम आकर मान लीजिए, गल्तियां किससे नहीं होती? बधाई हो रोहित और उससे भी ज्यादा। बधाई हो उज्जवला को जिसने रोहित जैसा बेटा पाया

Wednesday, July 25, 2012

मर्द की बपौती है, रासलीला

पिछले दो दिनों से मैं लगातार एक सवाल से जूझ रही हूं कि आखिर परंपराओं को निभाने और संस्कृति को कायम रखने का जिम्मा स्त्री का ही क्यों है? पुरुष और स्त्री के चरित्र की बात करते वक्त हम अलग-अलग चश्मा क्यों पहन लेते हैं? एक स्त्री अपने मनमुताबिक जिंदगी जीती है तो समाज उसे नामंजूर कर देता है। रासलीला तो कान्हा करते थे, राधा नहीं। मतलब रासलीला मर्द की बपौती है, औरत तो मीरा, सीता या फिर राधा हो सकती है। हालांकि यहां समाज भी दो हिस्सों में बंटा है। एक समाज वो जो उसी औरत के बिंदास और बेबाक रवैए का लुत्फ उठाता है। यह होता है युवा समाज, बुड्ढा समाज भी, अधेड़ समाज भी। इस समाज में केवल महिलाएं और अधिकांश बच्चे नहीं होते। और दूसरा समाज जिसमें इन सबके अलावा हर उम्र और वर्ग की महिलाएं भी शामिल होती हैं। यह समाज औरत के इस खुलेपन को परंपरा और संस्कृति के खिलाफ समझता है। चुभने वाली बात तो यह है कि वह पुरुष समाज भी इस तथाकथित पारंपरिक समाज की राय को पुख्ता करता है जो उस महिला के खुलेपन का केवल साझीदार होता है। जब खुलेपन की बात करते हैं तो कपड़े पहनने से लेकर मौज-मस्ती और खासतौर पर स्त्री-पुरुष के बीच शारीरिक संबंधों को शामिल किया जाता है। वैसे तो हमेशा से ही मेरे भीतर यह सारे सवाल सुलगते रहते हैं, लेकिन होमी अदजानिया द्वारा निर्देशित फिल्म ‘कॉकटेल’ को देखने के बाद तो इन सवालों से मानों लपटें सी उठनी लगीं हैं। कहानी अच्छी थी या बुरी। यह फिल्म समीक्षकों की चिंता है। लेकिन मैं बस फिल्म के तीन पात्र वेरोनिका, मीरा और गौतम की बात करूंगी। वेरोनिका बिंदास, अत्याधुनिक खुले विचारों वाली लड़की, जो कपड़ों को लेकर परंपरावादी नहीं है। जहां तक स्त्री-पुरुष के संबंध हैं उनमें बेहद खुली हुई। सेक्स उसके लिए रोजमर्रा की चीज है। गौतम भी बिल्कुल वैसा ही है। दोनों में खूब पटती है। दोनों अच्छे दोस्त हैं। साथ रहते हैं। दोनों एक बराबर बिस्तर साझा करते हैं। दोनों शादी को बोरिंग समझते हैं। परिवार उन्हें ऊबाता है। मतलब दोनों एक दूसरे का वाइस वर्सा हैं या कहें कि वेरोनिका और गौतम को अगर एक दूसरे से बदलें तो बस फर्क केवल औरत और मर्द होने का होगा। वहीं दूसरी तरफ मीरा परंपरावादी, संस्कृतिवान, ढकी-मुदी। उसके लिए परिवार घर ही सब कुछ है। शादी उसके लिए एक सलोना सपना है। यानी बिल्कुल वैसी जैसी कि भारतीय समाज में आम तौर पर लड़कियां होती हैं। कुछ भी अलग नहीं। लेकिन वेरोनिका की एक और खास बात है जो न तो गौतम में है और न हीं मीरा में। उसमें निर्णय लेने की क्षमता गजब की है। वह एक अनजान लड़की मीरा को अपने घर लेकर आती है। बगैर किसी स्वार्थ उसे अपने साथ अपनी खास सहेली की तरह रखती है। उसके आंसू पोछती है। खासकर फिल्म का वह संवाद जब मीरा वेरोनिका का खाली दूध का गिलास उससे मांगती है तब वह कहती है कि तुम नौकर नहीं हो जो.. लेकिन निर्देशक और उससे भी ज्यादा दर्शकों और समीक्षकों ने इस पूरे हिस्से को हासिए पर ही ला दिया। क्यों? क्या चरित्र को ठोस आधार देने में यह वाकया भी दर्ज नहीं होना चाहिए। यह किरदार को अन्य दो किरदारों के सामने बेहद भारी बनाता है। लेकिन आखिर में गौतम मीरा को चुनता है। मीरा भी गौतम के प्यार में गिरफ्तार हो जाती है। वेरोनिका रोती बिलखती है और फिर वह खुशी-खुशी उन दोनों की जोड़ी बना देती है। मतलब वेरोनिका स्त्री सो उसे परंपराएं तोड़ने और संस्कृति को बर्बाद करने की सजा और गौतम पुरुष सो उसे तो मिला मजा। यानी वेरोनिका और मीरा दोनों। और मीरा जो वेरोनिका की सबसे अच्छी दोस्त वह भी गौतम को खुली बाहों से अपनाती है। क्योंकि मर्द करे तो रासलीला, औरत करे तो कैरेक्टर ढीला। दुहाई है ऐसे समाज की और बलिहारू जाऊं मीरा की जो गौतम के चरित्र को अनदेखा कर उसे देवता बनाकर अपने मनमंदिर में स्थापित करती है।

Tuesday, April 17, 2012

कोलकाता की ‘हिटलर दीदी’

पश्चिम बंगाल की ममता दीदी इन दिनों पूरे देश की सुर्खियां बटोर रही हैं। केंद्र की सियासत में तो गाहे बगाहे अपना रुतबा दीखा ही देती हैं, इसके इतर राज्य में भी उनके फैसले चर्चा का विषय बने हुए हैं। अब देखिए न हालिया फरमान उनका सख्त होने के साथ ही रोचक भी है। उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी यानी तृणमूल के किसी भी कार्यकत्र्ता का संबंध किसी भी स्तर पर उनकी धुर विरोधी पार्टी सीपीएम से नहीं होना चाहिए। तृणमूल की नेता एवं खाद्य आपूर्ति मंत्री ज्योतिप्रिय मलिक ने दीदी के संदेश को कुछ इस तरह से पहुंचाया। ‘सीपीएम के साथ किसी भी तरह की रिस्तेदारी न बनाएं। यदि आप विरोधी पार्टी के किसी नेता से चाय की दुकान पर भी मिलते हैं तो उनसे बातचीत मत करिए। हमने सीपीएम के सामाजिक बहिष्कार की कसम खाई है। आपको यकीन दिलाना होगा की आप हमारी विपक्षी पार्टी के किसी नेता के परिवार से अपने परिवार के किसी व्यक्ति का वैवाहिक संबंध भूलकर भी नहीं होने देंगे।’ मेरी चिंता तो केवल इतनी है कि अगर दोनों परिवारों के बच्चों के बीच इश्क-विश्क का चक्कर चल गया तो फिर क्या होगा? खैर अब पार्टी कार्यकत्र्ता अपने बच्चों को पार्टी प्रमुख की हिदायत से वाकिफ करा ही देंगे। चिंता ये भी है कि सीपीएम पार्टी कार्यकत्र्ता और तृणमूल के लोगों को बीच अगर पहले से ही कोई संबंध हुआ तो? शायद ऐसा होने पर संबंध विच्छेद करने की हिदायत दी जाएगी। इन दिनों एक टीवी सीरियल काफी चर्चि हो रहा है, हिटलर दीदी। हो सकता है उसे दीदी से ही प्रेरणा मिली हो। यह मेरे निजी विचार हैं और अक्सर जैसा होता आया है कि निजी विचार में तथ्यों की जगह आत्मनिष्ठता हावी रहती है। उनके इस तुगलकी फरमान से साफ हो गया है कि दीदी के दामन को पकड़कर राजनीति करने के इच्छुक लोगों को दीदी के द्वारा बनाए गए दायरे तक ही सीमित रहना होगा। हाल ही में कोलकाता में एक और घटना घटी। जिसने ममता को कठोर होने पर मजबूर कर दिया। जादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने ममता दी के कुछ काटरून नेट पर डाल दिए। बस क्या था दी के कार्यकत्र्ताओं ने कर दी पिटाई। खैर, पुलिस ने दोनों को पकड़कर सलाखों के पीछे डाल दिया। अब वो बात अलग है कि कार्यकत्र्ता 500-500 का मुचलका देकर बरी हो गए। और बेचारे प्रोफेसर साहब को पूरी रात जेल में काटनी पड़ी। लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं कि दीदी तानाशाह हो गई हैं। लेकिन मेरा मानना कुछ और ही है। दरअसल दीदी लोकतंत्र का दायरा बनाने की कोशिश कर रही हैं। समाज में बराबरी लाने के लिए प्रयासरत हैं। तभी तो प्रोफेसर और उन्हें पीटने वाले कार्यकत्र्ता दोनों पकड़े गए। छोड़ने का वक्त अलग-अलगा था तो क्या? इतना तो चलता है। उनके साथ ट्रीटमेंट भी अलग हुआ होगा। इतना भी चलता है। दूसरी तरफ दीदी का एक और फैसला जो लोकतंत्र के हिमायतियों को कुछ अखर रहा है वो ये कि उन्होंने कार्ल मार्क्‍स को स्कूली पाठ्यक्रम से हटाने का प्रस्ताव रखा है। यहां भी दीदी का सोचना शायद यह हो की स्कूली बच्चों के मन मस्तिष्क में किसी भी विपरीत चिंतन के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। अब मार्क्‍स को पढ़ेंगे तो समाज के वर्गो में द्वंद्व पैदा होगा। जो कि विकास के लिए ठीक नहीं है। अब दीदी बड़ी हैं जो सोचा होगा समझकर ही सोचा होगा। दिनेश त्रिवेदी का मामला भी सबको पता ही है। नौ साल बाद किराया बढ़ाने पर उन्हें पद छोड़ना पड़ा।