Monday, November 25, 2013

स्टिंग की जरूरत ‘यहां’ नहीं ‘वहां’ है
विश्वामित्र बेहद चरित्रहीन व्यक्ति थे। अगर ऐसा कहें तो न जाने कितने लोगों को त्योरियां चढ़ जाएंगी। चढ़ें भी क्यों नहीं? विश्वामित्र प्रकांड तपस्वी थे। जिस वक्त मेनका उनके पास पहुंची तब भी वो ध्यानमग्न थे। मेनका का मकसद था, विश्वामित्र की तपस्या भंग करना। मेनका को इस काम के लिए जरिया बनाया था, इंद्र ने। इंद्र विश्वामित्र की तपस्या से डरा हुआ था। खैर, मेरा मकसद पौराणिक कथाएं बांचने का नहीं है। आम आदमी पार्टी के कुछ उम्मीदवारों का स्टिंग आपरेशन किया गया है। और उनके जरिए उन्हें लालची, भ्रष्टाचारी साबित करने की कोशिश की जा रही है। मैंने वो सारी स्क्रिप्ट पढ़ीं। इन स्क्रिप्ट से यही लग रहा है कि आप पार्टी के उम्मीदवारों से जबरन कुछ कहलवाने की कोशिश की जा रही है। क भी जमीन को कब्जे से छुड़ाने के लिए तो कहीं किसी धरने में शमिल होने के लिए। घूस देने के लिए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। कुल मिलाकर यही लग रहा है कि लालच देकर आप पार्टी के उम्मीदवारों का ईमान खरीदने की कोशिश की जा रही है। उन्हें पार्टी के लिए चंदा देने की बात भी कही गई है। अब दोबारा हम विश्वामित्र और मेनका की कहानी की तरफ चलें। क्या विश्वामित्र चरित्रहीन थे? विश्वामित्र की तपस्या टूट गई थी, जबकि वो ऋषि, तपस्वी थे। इसके लिए विश्वामित्र को चरित्रहीन नहीं ठहराया जा सकता है। वैसे ही जबरन किसी का ईमान डिगाने की कोशिश करने पर एक आम व्यक्ति का ऽा्रमित होना बड़ी बात नहीं है। हाालंकि यहां पूरी स्क्रिप्ट से कहीं ऽाी नहीं लगता कि आप पार्टी के उम्मीदवारों ने किसी तरह की घूस ली या फिर किसी गलत काम में साथ दिया। हर कोई मर्यादा पुरोस्तम राम और उनके ऽााई लक्ष्मण नहीं है जो स्रूपनखा के अद्वितीय सौंदर्य के सामने ऽाी डिगे नही। जिम्मेदारी उन लोगों की ऽाी है जो ईमानदारों को पथऽा्रष्ट करने की कोशिश करते हैं। मैं हिमायत आप पार्टी की नहीं कर रही हूं। बस इतना बता रही हूं, इस तरह के फूहड़ स्टिंग करने से बेहतर होगा कि उन नकाबपोश लोगों के स्टिंग करें जो अपने नाम और पद का फायदा उठाकर अपने मातहत लोगों का मानसिक और शारीरिक दोनों ही तरह का शोषण करते हैं। न जाने कितने तरुण तेजपाल हर दफ्तर में बैठे हैं। हर महिला अपने कार्यस्थल पर शोषण का शिकार होती ही है। डिग्री कम ज्यादा होती है। भद्दे मजाक, टिप्पणियां, और भद्दी भावभंगिमा हर दफ्तर में सहनी पड़ती हैं। महिला अगर तेज तर्रार है तो लोग डरते हैं, लेकिन ऐसे में भरसक कोशिश होती है कि ऐसी महिला को चरित्रहीन साबित कर दिया जाए। खैर इस विषय पर मैं बात में बोलूंगी। गरीबों के लिए लाई मनरेगा जैसी योजना में घोटाला हो रहे हैं, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का राशन हजम कर जाते हैं।

Friday, August 23, 2013

अंधविश्वास के खिलाफ कानून की जरूरत

महाराष्ट्र में अंधविश्वास के खिलाफ लड़ रहे नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई। लंबे समय से वो जादू-टोना, चमत्कारों की पोल वैज्ञानिक जांच करने के बाद खोल रहे थे। कई धार्मिक और कट्टरवादी संगठनों को उनका ये काम बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उन्होंने तो अंधविश्वास फैलाने वालों के खिलाफ कानून बनाने के लिए बहुत पहले ही एक कानूनी दस्तावेज भी तैयार कर लिया था। लेकिन विरोध के चलते राज्य विधानसभा में उसे पास नहीं किया जा सका। उनका ये काम वाकई में बहुत कठिन था। जहां देश की राजनीति मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों से तय होती हो, जहां कभी गणेश तो कभी शंकर की मूर्ति दूध पीने लगती है। औरतों को डायन कहकर उनके साथ मारपीट और कई बार तो जान से ही मार दिया जाता है। बिल्ली रास्ता काट जाए या छींक जाए तो अच्छे-अच्छे पढ़े लिखे लोग अपना रास्ता बदल देते हैं। गांव, मोहल्लों में बाबा बनकर लोग भोले भाले लोगों को अक्सर आर्शीवाद देकर उनसे पैसा, अनाज, बकरियां, मुर्गियां, गाय ठगते हैं। वहीं शहरों में भी  लोग सैकड़ों, हजारों यहां तक की लाखों खर्च कर देते हैं, राहू और शनि जैसे ग्रहों की शांति के नाम पर। लोगों के अंधविश्वास पर ही बड़े-बड़े आश्रम फल फूल रहे हैं। अब अगर दाभोलकर जैसा कोई समाज को इन अंधविश्वासों से आगे वैज्ञानिक सोच तक ले जाएगा, तो इससे नुकसान ढोंगी बाबाओं के साथ राजनेताओं को भी होगा। समाज में वैज्ञानिक सोच फैलने का मतलब है, मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों का छूटना, सांप्रदायिक मुद्दों पर भी लोग सोचने लगेंगे। फिर धर्म और संप्रदाय आधारित राजनीति का क्या होगा? बजरंग दल और विश्वहिंदू परिषद की धार्मिक यात्राओं का क्या होगा? आजकल तो मीडिया में भी सुबह सुबह ये बताया जाता है कि आपका दिन कैसा जाएगा? शादी नहीं हो रही है तो कौन ग्रह बाधा बन रहे हैं, नौकरी नहीं है तो क्या करें? निर्मल बाबा काली पर्स और समोसे के साथ चटनी खाने से किस्मत बदलने की दावा करते है। ये सब मीडिया में दिखाया जाता है। आपका दिन कैसा जाएगा? शादी नहीं हो रही या नौकरी नहीं है तो क्या करें? चमत्कारी माला और यंत्र टीवी पर खुलेआम बिक रहे हैं। अब जिस अंधविश्वास पर इतने लोगों का कारोबार निर्भर हो उसके खिलाफ लड़ने वाले की जान के दुश्मन तो लोग बनेंगे ही। हत्या होने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने हत्यारों के खिलाफ सूचना देने वाले को दस लाख रुपए पुरस्कार देने की घोषणा की है। लेकिन यही सरकार पिछले 14 सालों से इस कानूून को पास नहीं कर पा रही है। पर, अब देश के समझदार लोगों को चाहिए कि वो इस कानून के बनने के लिए राष्ट्रीय स्तर का अभियान छेड़ें।   

Wednesday, May 22, 2013

घूरते पहाड़ तोड़ते बच्चे


बुंदेलखंड के महोबा के कुलपहाड़ इलाके में पहाड़ों के खनन के दौरान पत्थर तोड़ता एक बच्चा   

घूरते हैंये बच्चे जब पूछो पढ़ाई क्यों नहीं करते
घूरते हैंये बच्चे जब पूछो खेल क्यों नहीं खेलते
बौखला जाते हैं, ये बच्चे जब पूछो उम्र क्या है?
तिलमिला जाते हैं, ये बच्चे जब बार-बार ये सब पूछो।
देखकर दूर से किसी शहरी को दूर भाग जाते हैंये बच्चे।
पीछाकर फिर दोहराव सवाल तो कहते हैंपता नहीं!
दूर पल्लू सिर पर लिए, कृशकाय खड़ी एक औरत।
देख रही अपने इन बच्चों को गुस्से और खीझ से।
पूछने पर ये सारे सवाल झल्लाती और खीझती है।
पढ़ाई से रोटी तो नहीं मिलती।
रोटी के लिए तोड़ने पड़ते हैं, पत्थर।
खेलेंगे तो रोटी कैसे खाएंगे।
रोटी के लिए चलाना पड़ता है, फावड़ा।
उम्र क्या करोगे पूछकर।
फिर अलापोगे सरकारी अलाप।
बताओगे शिक्षा का अधिकार है, इन्हें। 
तो सुन लो साल से ऊपर हो चुके हैं, ये बच्चे।
फिर वो चुप हो जाती है, शून्य में खो जाती है।
शायद अपने इस झूठ से आत्मग्लानि से भर जाती है।
फिर संभलती है, पल्ला सिर पर चढ़ाती है,फावड़ा उठाती है।
घूरती है मुझे और उन सभी सवालों को।
गरीबी से बड़ा गुनाह तो नहीं है, ये झूठ।
आत्मग्लानि फिर गुस्से में बदलती है, खीझती है।
और कहती है आधी ट्राली बांकी है,अभी पत्थर।
मत बर्बाद करो वक्तनियमों से रोटी तो नहीं मिलती।  


अयोध्या -सालों बीते पर अटक गया एक पल

16 दिसंबर, 2012 में भी कड़ी गई अयोध्या की सुरक्षा 

 कभी -कभी कोई पल सदियां तबाह कर देता है। उस पल के ऊपर से कई दिन, महीनें और साल दर साल गुजरते जाते हैं। पर वो पल गुजरता ही नहीं। 16 दिसंबर,1992 का एक पल। दो दशक से भी ज्यादा समय इस पल के ऊपर से गुजर चुका है लेकिन अब तक यह पल नहीं गुजरा। दो समुदायों के बीच पड़ी दरार अब एक खांई बन चुकी है। फैजाबाद के हर चैराहे, शहर और गांव के भीतर दंगा फसाद कराता ये पल लगातार पनप रहा है। राजनेताओं और दबंगों का हथियार बनें इस पल की धार दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। इस धार का शिकार हो रहे हैं आम लोग। जिनके लिए अयोध्या और बाबसी मस्जिद से ज्यादा मायनें रखती है, दो वक्त की रोटी। पिछले एक साल में करीब चार से पांच बार यहां जाना हुआ। हर बार कोई न कोई सांप्रदायिक मसला खबर बननें को आतुर दिखाई पड़ा। कभी फैजाबाद चैक में कभी टांडा में, तो कभी किसी दूर दराज के गांव में। इस बार फैजाबाद जिले के दो गांवों सैया और जोगियापुर से ये पल गुजरा। हिंदू दलितों की बस्ती सैया और मुस्लिमों की बस्ती जोगियापुर। जोगियापुर को लोग फैजाबाद का इस्लामनगर भी कहते हैं। अबकी करीब दो महीनें पहले फैजाबाद जाना हुआ। हर बार की तरह इस बार भी हिंदू और मुसलमान के बीच एक झगड़े की खबर मिली। हमेशा की तरह झगड़े की जड़ तक जानें के लिए दोनों पक्षों से पूछताछ का मन बनाया। सबसे पहले पहुंची हरिजनों के एक गांव सैयापुर। झगड़े में शामिल परिवार से मिली। हिंदू दलित परिवार ने अपनी आप बीती सुनाई। मारपीट के दौरान सिर फूटने से घायल एक व्यक्ति ने कहना शुरू किया, हमारे खेत जोगियापुर गांव के करीब हैं। हम लोग बहुत शरीफ लोग हैं। हमारा किसी से लड़ाई झगड़ा आज तक नहीं हुआ। लेकिन उस दिन खेत में कुछ बकरियां घुस आईं तो हमनें उन्हें लखेद दिया। बस अब का बताएं उन बकरियों की मालकिन ने तो गाली गलौच शुरू कर दीं। हमें भी गुस्सा आ गया और हमनें भी दुई चार सुना दईं। औरत जात के मुंह अब कौन लगे? हमनें उससे कहा कि आगे से तुम्हारी बकरियां हियां न दिखाई दई जाएं। जो लाठी उसनें बकरियों को लखेदने के लिए ले रखी थी, वही लाठी उसनें हमारे ऊपर चला दी। हमनें भी गुस्से में एक झापड़ रसीद कर दिया। बस उनकें यहां से दस बारह जनें आकर हमारे चाचा, हमें और हमारे भाई को पीट गए। मुसलमान हैं, सो प्रशासन भी उनकी तरफ है। दूसरे पक्ष की सुनने के लिए आगे के गांव जोगियापुर पहुंची। इस गांव में करीब सवा सौ घर हैं, सभी घर मुसलमानों के ही हैं। घर पूंछकर उस परिवार के पास पहुंची। वहां उस औरत से मुलाकात हुई। जिससे झगड़ा हुआ था। उसके भी चोट आई थी। अब उससे उस झगड़े की हकीकत जानने के लिहाज से मैंने पूछा क्या हुआ था, उस दिन। हम तो शरीफ लोग हैं, कभी भी हमारी किसी से लड़ाई नहीं हुई। पूरे गांव में पता लगा लो। लेकिन उस दिन तो उन लोगों ने बात शुरू की। हम अपनी छेरी को चरा रहे थे। अब जानवर तो जानवर क्या करें। बिदक गया। उनके खेत में चला गया। खेत में खड़े उस व्यक्ति ने हमें पहले गाली दी। फिर मारना शुरू कर दिया। बाद में उसके घर के लोग यहां आए और हमारे पति और हमें खूब मारा। अब हम तो मुसलमान हैं, तो प्रशासन भी उनकी तरफ है। हमारे आदमी जेल में बंद हैं। गांव में भी जगह-जगह आग लगा गए। आग की बात सामने आई तो पूछा आग क्यों लगाई। जोगिया पुर के एक बुजुर्ग ने बताया कि हिंदू हैं, सो इस लड़ाई के बहानें पूरा गांव ही तबाह करना चाहते थे। अब इस बात की सच्चाई जानने के लिए फिर सैयापुर गई। पूछा तो वो लोग आग बबूला हो गए और बताया कि आग खुद उन लोगों ने लगाई है। जिससे मामला बड़ा बन जाए। मुसलमान हैं तो मुआवजा तो जल्दी ही मिल जाएगा। कुछ लोगों को तो मिल भी चुका है। दोनों ही गांवों में पुलिस की टुकड़ियां तैनात थीं। छावनीं में तब्दील हो चुके दोनों गांव का माहौल कर्फ्यूग्रस्त था। अब दोनों पक्षों के बाद सोचा क्यों न पुलिस वालों से हकीकत पता करूं। तो पुलिस वालों ने कहा मैडम अब आप ही बताईये। क्या गांवों में किसी के जानवर का किसी के खेत में घुस जाना नई बात है। ये झगड़े तो होते ही रहते हैं। पर जबसे अयोध्या कांड क्या हुआ। बस हर झगड़ा हिंदू और मुसलमान का चश्मा चढ़ाकर देखा जाने लगा। पुलिस तैनात करने की वजह ये है कि कहीं ये व्यक्तिगत झगड़ा सांप्रदायिक दंगा न बन जाए। कुछ दिनों पहले एक दुकानदार को पांच रुपए कम देनें से शुरू हुआ झगड़ा, हिंदू बनाम मुस्लिम बन गया।

Wednesday, March 13, 2013

जुम्मन का घर फिर क्यों जले...

फैजाबाद गयी तो टांडा गए बगैर रहा नहीं गया । फैजाबाद से करीब 45 किलोमीटर दूर बसे अंबेडकर नगर का एक कस्बा है, टांडा । लुंगी और गमछा के लिए प्रसिद्ध कस्बे में इन दिनों सांप्रदायिक तांडव चल रहा है । वैसे तो उत्तर प्रदेश के लिए सांप्रदायिक बलवा कुछ नयी बात नहीं है । लेकिन यह मामला कुछ हालिया है, और किस्मत से यहां जाने को भी मिल गया । सो देखने परखने को मिला कि आखिर कैसे दो खास समुदाय के लोग अचानक भिड़ जाते हैं। कैसे मरने औऱ मारने वाला इंसान से पहले हिंदू या मुसलमा हो जाता है ?नहीं-नहीं अचानक तो कुछ भी नहीं होता । हाल ही में मेरे दोस्त ने एक शेर सुनाया था, वक्त करता है परवरिश मुद्दतों, हादसा यक बा यक नहीं होता। । तो वाकई टांडा में भी जो हो रहा है या जो हुआ अकस्मात नहीं हुआ । इस कस्बे के मोहल्ले अलीगंज में बेहद रसूक वाले हिंदू युवा वाहिनी के जिला अध्यक्ष राम बाबू गुप्ता की हत्या तीन मार्च को कर दी गई । रामबाबू के घर का पता पूछने पर पास खड़े रिक्शे वाले ने कहा हंशराज वाले गुप्ता जी , जो अल्लाह को प्यारे हो गए। दरअसल हंशराज के नाम से उनका मेडिकल स्टोर है। मैंने कहा जी बिल्कुल वही । रिक्शे में बैठी तो चालक से कुछ जानने की गरज से पूछा आखिर हत्या क्यों कर दी गई। जी राजनीती का अंत तो मौत ही है। कुरेदने के लिहाज से मैंने फिर पूछा क्या ये हिंदू-मुस्लमान से जुड़ा मामला है। रिक्शे वाले का जवाब या यों कहें सवाल के जवाब में एक सवाल बेहद तीखा और मुझे चिढ़ाने वाला जैसा लगा। क्या इससे पहले इलाके में हत्या नहीं हुईं ? जिंदा रहते हैं तब भी लड़ाते हैं। और मरने के बाद वसीहत छोड़ जाते हैं अपने चमचों के नाम कि हमने बड़ी मुश्किल से संप्रदाय और धर्म का जहर देकर इस शहर को बर्बाद रखा है, उसे आगे भी आबाद न होने देने का जिम्मा तुम्हारा है। न मारने वाला राम का भक्त था न मारने वाला रहीम का । गुप्ता जी तो सात भाई हैं सो दबंगों सा दबदबा है । न होता तो एक हत्या के बदले इतने घर बर्बाद न कर देते। फिर हत्या तो किसी एक ने करवाई थी तो फिर इतने मुसलमानों का घर क्यों फूंक दिया ? रिक्शेवाले की बातें सुनते सुनते लगा शायद अदम गोंडवी ने भी एसे ही हालात के लिए लिखा होगा।..गर गल्तियां बाबर की थीं, तो जुम्मन का घर फिर क्यों जले/एसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िए । शायद यह संवाद औऱ चलता लेकिन इससे पहले ही घर घा आ गया। लोहे के चैनल लगे इस घर में लोगों का तांता लगा था। मैंने पहुंचकर अपना परिचय दिया। और उनके किसी सगे संबंधी से मिलने की इच्छा जताई । छोटे भाई श्याम बाबू ने बताना शुरू किया । टांडा के भीतर हिंदुओं में अगर कोई सशक्त परिवार है तो बस हमारा ही । मुसलमानों की हिम्मत नहीं पड़ती थी । हालांकि इस पूरे मोहल्ले अलीगंज में तीन ही घर हिंदुओं के हैं। इनमें से दो तो सीधे साधे गरीब लोग हैं । उनकी हिफाजत तो हम ही लोग करते हैं । हिंदुओं का दबदबा कायम था राम बाबू की वजह से । आंखों की किरकिरी बन गए थे ये, सो..ले ली जान । पीछे से एक आवाज आई कहते तो घूम रहे हैं कि सबसे मजबूत खंभा उखाड़ दिया। पीछे पलटकर मैंने जानना चाहा किसी खास व्यक्ति ने एसा कहा क्या, तो उन जनाब ने कहा, नहीं खबरें उड़ रही हैं। यानी कनबतिया हो रही हैं। या शायद राम बाबू को एक हिंदुत्व का एक मजबूत खम्भा मानने वाले लोगों का अपना विश्लेषण भी हो सकता है । जो भी हो...। मैंने फिर पूछा ये अचानक हुआ या फिर हाल में कुछ संकेत मिले थे आप लोगों को। नहीं ताक में तो ये लोग पहले से ही बैठे थे। 15 अगस्त 2012 को एक हिंदू लड़की को एक मुसलमान लड़के ने छेड़ दिया था। राम बाबू ने उसकी गिरफ्तारी के लिए मोर्चा खोल दिया था। 22 अगस्त को हजारों लोगों के साथ मिलकर प्रदर्शन किया। मजबूर होकर प्रशासन को हरकत में आना पड़ा। तब जाकर एफआईआर दर्ज हुई। इससे पहले भी इसी तरह का एक मसला 2010 का है। तब भी राम बाबू ही बीच में कूदे थे। आरोपी इस बार भी मुसलमान समुदाय का था। फिर उन्होंने बताया अयोध्या में जब मस्जिद गिरी थी, तब भी हजारों मुसलमानों ने हमारा ही घर घेरा था। कई और किस्से बताए। और फिर इन किस्सों का निचोड़ भी बताया कि दरअसल मुस्लिम समुदाय के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा हमारा ही परिवार है। श्याम बाबू खुद भी विश्व हिंदू परिषद के सदस्य हैं। उनकी बातें सुनते-सुनते मुझे रिक्शेवाले की बातें भी याद आ रही थीं। लगा राम बाबू श्याम बाबू के नाम वसीहत छोड़ गए हैं। वसीहत जिसमें लिखा है, अब इस संप्रदाय को जीवित रखने का जिम्मा तुम्हारा है। उन्हेंने रामबाबू बनाम अजीमुल हक यानी उस अंबेडकर नगर के मुस्लिम विधायक की लड़ाई को बड़े एहतियात से हिंदू बनाम मुस्लिम बना दिया था। नहीं तो सच ही तो है हत्याएं तो रोज ही होती हैं। उसी दिन के अखबार में पास के ही गांव में एक युवक की हत्या हुई थी। कसी ने नहीं पूछा था कि इस हिंदू युवको को किसने मारा ? क्या मुसलमान ने ? मैंने फिर पूछा पता चला है कि जिस दिन यानी तीन मार्च को रामबाबू की हत्या हुई। उसी दिन आधी रात को यहां से करीब 500 से 700 मीटर की दूरी पर बसी एक बस्ती धुरिया में कई घर हिंदू संगठन के लोगों ने जला दिए । उन्होंने इस आरोप से इनकार तो किया पर इकरार के साथ। हमने एसा कुछ नहीं किया। हम सबकुछ कानूनी प्रक्रिया से चाहते हैं। लेकिन दूसरे ही पल उन्होंने यह भी कहा किसी दल के नेता को मारकर यूं ही थोड़े बच जाओगे । उनकी पत्नी संजू देवी से मिली। रो-रोकर उनका बुरा हाल था। हलक से आवाज नहीं निकल रही थी। बमुश्रिकल 36-37साल की रही होंगी। बस एक ही बात वो दोहराई जा रही थीं कि हत्यारे को पकड़ा जाए। पहलवान ही है उनका हत्यारा। उसे सजा मिले। पहलवान यानी वहां का सपाई विधयाक अजीमुल हक। दुश्मनी की त्रासदी यही होती है कि असल दुश्मन से ज्यादा दुश्मन के चहेतों पर वार करती है । हर दुश्मनी की तरह इस दुश्मनी की परिणति भी यही हुई । यकीनन इसी तरह अयोध्या भी सांप्रदायिक हुई होगा । इसी तरह गुजरात ।

Tuesday, February 26, 2013

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/39639-2013-02-26-04-39-13

Wednesday, February 20, 2013

फांसी के सियासी मायनें!

मानवाधिकारों की रक्षा के लिए बनीं अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा बनाए गए दस्तावेज के आर्टिकल-5 के अनुसार ‘सजा के नाम पर किसी भी व्यक्ति के साथ क्रूर, अपमानजनक या अमानवीय या पीड़ादायक व्यवहार नहीं किया जा सकता है।’ फिर मौत की सजा तो सबसे ज्यादा क्रूर और अमानवीय व्यवहार है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए यह संस्था मौत की सजा का विरोध करती है। संस्था का यह भी तर्क है कि अपराधी को सजा देने से अपराध कम नहीं होता। इस संस्था ने भारत में पिछले तीन महीनों के भीतर दो अपराधियों को सजा देने पर विरोध जताया है। दुनियाभर के करीब 200 देशों में से 193 देश इस संस्था के सदस्य हैं। इससे जुड़े लगभग सभी देशों ने भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस तरह की सजा दिए जाने की आलोचना की है। इस संस्था के 96 सदस्य देशों में मौत की सजा पूरी तरह से खत्म की जा चुकी है। 34 देशों में इस मुद्दे को लेकर गंभीर चर्चा की जा रही है। ऐेसे में भारत में फांसी की सजा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर बवाल खड़ा कर दिया है। देश के भीतर भी कई सामाजिक संस्थाओं, वकीलों और न्यायाधीशों ने सरकार के इस फैसले की आलोचना की है। हाल ही में दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद जस्टिस वर्मा की कमेटी द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में भी साफतौर पर कहा गया था कि कहीं ऐसा प्रमाण नहीं मिलता कि मौत की सजा अपराधों को कम करने में मददगार साबित हुई हो। लेकिन सरकार ने फिर भी ऐसी स्थिति जहां बेहद क्रूर तरह से बलात्कार किया गया हो या बलात्कार के बाद इसका सामना करने वाली लड़की की हत्या कर दी गई हो। हड़बड़ी में लाए गए अपने अध्यादेश में इन दोनों ही परिस्थितियों में सरकार ने अपराधियों के लिए फांसी की सजा बनाए रखी है। यह रिपोर्ट कई महिला एवं अन्य सामाजिक संगठनों और देश के आम लोगों की राय के बाद बनाई गई थी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि देश में तीन महीनों के भीतर दो अपराधियों को फांसी की सजा क्यों दी गई है? अजमल कसाब मुंबई हमलों का मास्टर माइंड और अफजल गुरु संसद में हमला करने का दोषी था। चंदन की तस्करी करने वाले वीरप्पन के चार साथी भी इस लाईन में खड़े हैं। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने अभी इस पर रोक लगा दी है। कई राजनीतिक विशेषज्ञ इन दोनों ही सजाओं को 2014 में देश में होने वाले लोकसभा चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। अपने दोनों कार्यकालों (साल 2004 से लगातार केंद्र में) में भ्रष्टाचार, अपराधों और महंगाई पर लगाम लगाने में असफल रही सरकार ऐसा करके यह दिखाना चाहती है कि वह अपराधों को लेकर गंभीर है और न्याय व्यवस्था को सुधारने का दिखावा कर रही है। जिससे आम लोगों के वोट खींचे जा सकें।