Monday, June 14, 2010

दुल्हन को नहीं जचा दूल्हा

दुल्हन को नहीं जचा दूल्हा
उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर के कछवां थाना क्षेत्र के करसडा गांव में दूल्हे की सूरत देखकर दुल्हन बिदग गई। मां-बाप, गांव-टोला की मानमनौव्वल के बाद भी लड़की ने शादी करने से साफ मना कर दिया। लड़के वालों ने अपनी इज्जत का हवाला देकर लड़की को अपना फैसला वापिस लेने के लिए कहा, लड़की फिर भी नहीं मानीं। थक-हार का पंचायत बैठी और लेन-देन की रकम वापिस दे-दिवाकर बारात वापस लौटा दी गई। मतलब दुल्हा बैरंग ही वापिस चला गया। घटना बड़ी नहीं है, मगर जिस जगह यह वाकया पेश आया उस छोटे से गांव को कोई जानता भी नहीं। लड़की का सरेआम लड़के की शक्ल-ओ-सूरत पर एतराज बरतनकर उसे बाहर का रास्ता दिखाना एक साहस का काम तो है। क्योंकि शादी के नब्बे फीसदी मामलों में पसंद नापसंद का अधिकार आज भी वर पक्ष को है। लड़के के बाप को दहेज पसंद आना चाहिए, मां को लड़की के गुण और फिर लड़के को लड़की पसंद आनी चाहिए। मतलब दहेज, गुण, खुबसूरती इन तीनों को मिला जुला कर जो कुछ भी बने वही है, दुल्हन। मतलब दुल्हन वही जो सास, ससुर और पिया मन भाए। वर बनने के करीब पहुंचे दूल्हे पर वाकई बहुत बुरी गुजरी होगी। लड़के के दुख से मैं भी दुखी हूं, लेकिन यह बदलाव है। गांव की गोरी जब काले दूल्हे को अंगूठा दिखा सकती है, तो शहर की छोरियां बाप रे बाप।
घटना को थोड़ा गंभीरता से लें तो इसके कई मायनें हैं। पहले भी बारातें लौटती थीं लेकिन वापिस लौटने के सौ में से निन्यानवे मामलों में लड़के वाले दहेज की मांग पूरी न होने पर लड़की वाले को उठ जाने की धमकी देते थे। वर्ष 2001 में राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी फिल्म लज्जा में दुल्हन का पिता दुल्हन के पिता को बार-बार उठ जाने की धमकी देता है, दुल्हन यह बात सुन लेती है और प्रेमी से दुल्हे बने लड़के को यह बताती है, दुल्हा यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेता है कि मामला बड़ों का है। आखिरकार लड़की व्रिोह कर देती है। इससे पहले और इससे बाद में न जाने कितनी फिल्मों में इस दृश्य को दोहराया गया। फिल्मों से बाहर भी ऐसी घटनाएं बार -बार होती रहीं। हालिया कुछेक घटनाओं में दुल्हन ने दुल्हे को बैरंग वापिस भी किया। लेकिन मौजूदा घटना शहर से दूर एक ऐसे गांव की है, जिसके बारे में कम ही लोग जानते होंगे। दुल्हे को बैरंग लौटते वक्त गुस्सा भी आया होगा और दुख भी लगा होगा। यह जायज भी है। खैर पूरी घटना का जिक्र मैंने नारी सशक्तिकरण की मिसाल देने के लिए नहीं किया है। जब दूर-दराज में रहने वाली कोई लड़की इतना बड़ा कदम उठा सकती है, तो दिल्ली के सटे हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायतों के खिलाफ स्थानीय युवा और युवतियां क्यों खामोश हैं। अपने ही दोस्त, भाई-बहन के लिए जारी तुगलकी फरमानों के खिलाफ बोलने के लिए कोई क्यों नहीं आगे आता। हालांकि खाप पंचायतों का तर्क गलत है या सही है, इस पर अलग से चर्चा हो रही है और होनी भी चाहिए। करसडा गांव की सीधी-साधी लड़की शादी जसे अहम फैसले में अपनी राय बड़ों को मनवा सकती है, तो...यहां क्यों नहीं।

Sunday, September 13, 2009

इश्क इबादत से इश्क कमीना तक..

इश्क इबादत. इश्क खुदा, इश्क के रोग बनने तक भी मामला हाथ में था। लेकिन जब से इश्क कमीना हुआ, तब से सारे आशिक निकम्मे हो गए हैं। ऐसा लोग कहते हैं मैं नहीं। मुङो तो लागता है कि आधुनिक आशिक समय प्रबंधन की बर्बादो को लेकर बेहद सजग हैं। अब देखिए न कल तक जहां इजहारे मोहब्बत में सालों लग जाते थे। और कभी-कभी तो खिलौना फिल्म के नायक की तरह नायिका की शादी में अपने टूटे हुए दिल का तोहफा लेकर पहुंच जाया करते थे। इजहार करने के बाद भी सालों पेड़ के चक्कर लगाते या फिर छिप-छिपकर छत में मिलते थे। लेकिन आज का नायक नायिका से बस एक रात साथ गुजारने की गुजारिश करते हुए सुबह तक प्यार करने की बात करता है। सुना है आजकल तो इश्कखोर फोन पर ही प्रेम पियाला पूरा का पूरा गड़प कर जाते हैं। खैर इस बार में मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूंगी किसी की निजता भंग करना मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं है।
लेकिन आप ही बताइये क्या इश्क जसे विषय पर सालों बर्बाद करना ठीक था। आज जहां एक मामलों को सुलझाने के लिए अदालतों में मुकदमें की फाइलें सालों-साल बाट जोह रही हैं। सरकारी फाइलों धूल और चूहों का शिकार हो रही हैं वहीं आशिक एक साथ कई मामलों को निपटाता है। अब सरकारी दफ्तरों और अदालतों में लंबित पड़ी फाइलों और मामलों को निपटाने के लिए अधिकृत बाबुओं और वकीलों को इनसे सीख लेनी चाहिए।

Sunday, September 6, 2009

मोहे काहे विदेश..

शादी-ब्याह के मौकों पर लड़की के घर की महिलाएं एक गीत गाती हैं। बाबुल भइया के लाने महल-दुमहला, मोहे काहे परदेश.. मुङो पूरा गाना याद नहीं। लेकिन इसका लब्बोलुआब है कि भाई को तो आप घर में रखेंगे। लेकिन मुङो परदेश क्यों भेज रहे हैं। यहां परदेश से मतलब विदेश नहीं बल्कि लड़की की ससुराल है। हाल ही में कई ऐसी घटनाएं सामने आयीं जिनमें मां-बाप ने वाकई में अपनी बेटियों को विदेश में ब्याह दिया। उन्होंने यह पड़ताल करने की जरूरत भी नहीं समझी की लड़के का चाल-चलन कैसा है। हमारे देश के लोग विदेश जाते हैं और वहां से विदेशी बाबू होकर यह कहते हुए लौटते हैं कि उन्हें भारतीय संस्कारों वाली भारतीय बाला से ही शादी करनी है।
लड़की के मां -बाप इसे अपनी लड़की का सौभाग्य समझकर फौरन शादी करने को तैयार हो जाते हैं। अब चूंकि लड़का विदेशी है, उसके पास सीमित समय है।इसलिए शादी भी अफरा-तफरी में होती है। लड़की के घरवाले इस आफर को ठुकराना नहीं चाहते और अपनी लाडो को भेज देते हैं विदेशी बाबू के साथ। वहां न जान न पहचान। अभी तक जो लड़का भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर भारतीय नारी को अपनी संगनि बनाने को आतुर था अब उसे ही भारतीय संस्कृति पिछड़ेपन का प्रतीक लगने लगती है। इस पूरी रामकथा के पीछे मेरी मंशा उस लड़की की कहानी लिखने की है जो समृद्ध मां बाप की बेटी है, बेहद चंचल, चुलबुली थी। कक्षा में अव्वल आने वाली। बेहद मासूम, खुबसूरत। फिलहाल वो सरिता विहार के एक एमबीए कालेज से पढ़ायी कर रही है। लेकिन इस बीच उसके साथ जो घटा वह उन मां बाप के लिए सीख है, जो बगैर किसी जांच-पड़ताल अपनी बिटिया को सात समंदर पार किसी अजनबी के साथ भेज देते हैं। अभी कुछ दिन पहले मैं अपनी दोस्त के घर मैं इस लड़की से मिली। उसने अपनी पढ़ायी की बात छेड़ दी। लेकिन एक बात जो उसने कही कि उसका आत्मविश्वास बिल्कुल चुक चुका है। मैं किसी को फेस ही नहीं कर पाती। उसके जाने के बाद मैंने उसकी आवाज, और खुबसूरती की तारीफ मैंने अपनी दोस्त से की। साथ उसके इस डर के बारे में भी पूछा। जब मेरी दोस्त ने बताया कि इसकी शादी हो चुकी है।दुबई में रहने वाले एक युवक से इसकी शादी की गयी। शुरू-शुरू में लड़की अपने देश में ही रही। जहां ससुराल वालों ने उस पर दहेज लाने का दबाव बनाया। ससुरालियों की प्रताड़ना के बारे में लड़की ने अपने मां-बाप को कई बार बताया। लेकिन हर बार मायके से वही घिसी-पिटी सलाह, बेटा एडजस्ट तो करना ही पड़ता है। खैर इस बीच लड़की के पति ने उसे अपने साथ दुबयी ले जाने का प्लान बनाया। लड़की को लगा अब उसकी मुसीबत खत्म हो गयी। लेकिन पति यहां उसे अपने साथ दंपति जीवन बिताने नहीं बल्कि उसे बेचने लाया था। इस बात का खुलासा उस वक्त हुआ जब एक दिन पति की गैर हाजिरी में कई लोग उसके घर आ धमके। खैर लड़की ने किसी तरह उनसे पिंड छुड़ाया। अपने गहने वगैरहा बेचकर फ्लाइट लेकर दिल्ली आ गयी। तीन-चार दिन दिल्ली भटकने के बाद वह अपने घर पहुंची। उस लड़की की दाग मैं इसलिए देना चाहूंगी क्योंकि वह लड़की बाइज्जद अपने घर लौट आयी। उसने यह बात जब अपने घर वालों को बतायी तो उन्होंने ससुरालियों को तलब करने की बजाए इस मामले को दबाने की मंशा से उसे दिल्ली में एमबीए करने भेज दिया। कानूनी पचड़े में वह नहीं पड़ना चाहते। वजह हमारे भ्रष्ट एवं सुस्त कानूनी प्रक्रिया का होना हो सकती है। मेरा मकसद यहां कानून व्यवस्था पर उंगली उठाना नहीं है। लेकिन क्यों मां-बाप अपनी बिटिया को सात समंदर भेजने से पहले कोई पड़ताल नहीं करते। क्यों बेटी को विदेश ब्याहने को स्टेटस सिंबल समझते हैं।
आखिर में मुङो अपने घर में होने वाली चर्चा की याद आ गयी मैंने अक्सर लड़की के मां-बाप को यह कहते सुना है कि बिटिया के ण से उण हो जाएं बस गंगा नहाएंगे। बिटिया कोई उधार नहीं है जिसे आप दहेज देकर चुकता करें। गाय की तरह किसी भी खूंटे से बांधने से पहले यह तो सोंचे की यह खूंटा किसी कसाई का तो नहीं।