Saturday, March 24, 2012

बर्फ पिघलने की कामना...

खुशकिस्मत है वो सास जिसे अच्छी बहू मिल जाए। इस मामले में मेरी किराएदारिन बड़ी भाग्यशाली हैं। एक तो बहू कमाऊ है ऊपर से स्वाभाव भी बहुत अच्छा है। आज ही सुबह मिली तो कह रही थी आंटी बस अब कुछ दिन ही तो आपके साथ हैं। डेढ़ करोड़ की कोठी खरीदी है। खरीदें भी क्यों न लड़का-बहू दोनों कमाऊ हैं। पति की अच्छी खासी जॉब है। अपने लड़के के लिए मैं बस ऐसी ही बहू चाहती हूं। दरअसल बस में बैठी तीन महिलाएं बहू चर्चा में तल्लीन थीं। तीनों संभ्रांत परिवार से थीं। उनमें से एक महिला जो कुछ अधेड़ थी, ने अपने लिए बिल्कुल वैसी ही पुत्र वधू की कामना की जैसी उनकी किराएदारिन की है। अंतिम वाक्य पूरा करते-करते उनकी सांस कुछ लंबी और आंखें ऊपर को हो गईं थीं। मानों ईश्वर से किसी गंभीर वरदान की कामना कर रही हों। अब स्पष्ट ये नहीं था कि बहू का सीधा-सरल स्वाभाव संभावित सास को भाया या उसके ऊंचे ओहदे की नौकरी। हो सकता है दोनों का मिला-जुला असर हो। पर सुकून वाली बात यह है कि चिरकाल से सास रूपी प्रजाति और बहू रूपी प्रजाति के बीच जारी शीत युद्ध में कुछ गर्माहट का एहसास हुआ। लगता है दोनों के बीच जमीं बर्फ पिघलने लगी है। ईश्वर करे कि इन तीन महिलाओं की बात दूर तलक जाए। हर सास के जहन में उतरे और इस रिस्ते में मिसरी घोले। संभावित बहू होने के नाते मेरा भी दायित्व बनता है कि मैं अपनी प्रजाति के बीच इस संदेश को फैलाऊं। और बताऊं कि सांसे अब बहुओं पर शासन नहीं बल्कि उनसे सामंजस्य बनाना चाहती हैं। उन तीनों में से एक महिला जो बामुश्किल तीन-चार साल पहले ही बहू बनीं थी। इस चर्चा में उसकी टिप्पणी भी दर्ज करने लायक है। मेरी सास और मेरे बीच में कभी कोई खटर-पटर नहीं होती। जब मम्मी गांव चली जातीं हैं तो मैं तो बिल्कुल परेशान हो जाती हूं। ये तो सारा दिन बाहर रहते हैं और मैं अकेली खटती रहती हूं। मम्मी से बड़ा सहारा है। बेटे की देखभाल भी बिल्कुल अच्छी तरह होती है। अब यहां भी वही सवाल उठता है जो ऊपर उठा था कि मम्मी के काम का सहारा है या फिर मम्मी का साथ सुहाता है। लेकिन बात जो भी हो यह टिप्पणी दुनिया के सबसे ज्यादा चर्चित रिस्ते के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यह बयान आधिकारिक तौर पर उस महिला ने दिया जो हालिया बहू बनी है और उसके सास बनने की पृष्ठभूमि बन चुकी है। क्योंकि उसके बेटा हो चुका है। तीसरी महिला निर्विकार भाव से दोनों को सुन रही थी। मानों इस ऐतिहासिक बदलाव की प्रत्यक्षदर्शी बन कर इतिहास के पन्नों में दर्ज होना चाहती हो। और मैं सोच रही थी, पर्यावरण के लिहाज से भले ही ग्लेशियरों का पिघलना खतरनाक हो। कई सारी आपदाओं को न्यौता हो। लेकिन इस संबंध में अब गर्माहट आना बेहद जरूरी है। दोनों पक्षों के मन में बन चुके ग्लेशियर जितनी जल्दी पिघलें उतना अच्छा होगा। व्यक्ति, घर, परिवार और समाज के लिए।

Thursday, February 2, 2012

घूरते भूखे बच्चे

एक बच्चे का घूरना मुङो अंदर तक झकझोर गया। मेरा गुनाह था कि मैंने उसे भीख देने से मना कर दिया था। कृशकाय वाला वह बच्च उघारा था। उसने मुझसे दो-एक रुपए की उम्मीद लगाई थी। लेकिन मैंने उसे भीख नहीं दी। क्योंकि इससे पहले मैं एक ऐसे ही बच्चे को एक सिक्का थमा चुकी थी। दरअसल हाल ही में अपनी मां को लेने मैं निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंची। समय पता किया तो गाड़ी तय समय से तकरीबन डेढ़ घंटे देर से आनी थी। मेरे घुमक्कड़ी मन ने वहां ठहरना मंजूर नहीं किया। और मैं निकल पड़ी आसपास का जायजा लेने। प्यास लगी सो पानी की बोतल लेने एक पुराने से होटल में पहुंची। पैसे निकाले ही थे कि एक बच्चे ने आकर मुङो हल्के से छुआ। मैं घूमी तो बच्चे ने मुङो उम्मीद भरी नजरों से देखा। पहले तो मैंने उसे नजरअंदाज करना चाहा। तर्क था कि भीख को बढ़ावा देना गुनाह है। कुछ देर ठिठकी। लेकिन उस नंगेबदन बच्चे को देखकर न जाने क्यों सिहरन से पैदा हुई। मेरे भीतर के तार्किक इंसान पर मेरे ही भीतर का दयालू इंसान हावी हो गया। उस वक्त मुङो पता चला कि वाकई हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी। और मैंने उसे दो रुपए का सिक्का दे दिया। अभी बोतल हाथ में आई भी नहीं थी कि एक दूसरे बच्चे ने मुङो हिलाया मानों कह रहा हो कि 15 रुपए बर्बाद न करो। होटल के बाहर हैंडपाइप से पानी पी लो। क्या बिगड़ जाएगा? हालांकि उसने केवल मुङो हिलाया भर था, कहा कुछ भी नहीं था। पर न जाने क्यों उसे देखते हुए ये सब बातें मेरे मन में आ गईं। मैंने उसे अनदेखा करना चाहा तो उसने मुङो फिर हिलाया। और कहा, भूख लगी है। उसने भी कपड़े नहीं पहने थे, दुबले-पतले से उस बच्चे को देखकर मुङो उसकी बात पर यकीन करने का मन कर रहा था। लेकिन बोतल लेकर मैंने अपना रास्ता पकड़ा और निकल ली। पीछे घूमकर देखा। या उस बच्चे की घूरती हुई आंखों ने मुङो बरबस ही पलटने पर मजबूर किया। पहले जो बच्च याचक नजर आ रहा था अब वह कुछ उग्र था। उसने मुङो हिकारत भरी नजरों देखा और कुछ गालियों जैसा ही दिया। मैंने पानी पीने के लिए बोतल खोली तो लगा वह बच्च फिर मुङो झकझोर रहा है कि लानत है तुम पर। अब मैं स्टेशन पहुंच चुकी थी, मैं। मम्मी का फोन आया कि कहां हो बिटिया मैं पहुंच गई हूं। मैंने उन्हें रिसीव किया। मम्मी के आने की खुशी में मैं सबकुछ भूल चुकी थी। उनकी विशेष फरमाइश पर हाल ही में उन्हें मैं कालकाजी मंदिर ले गई वहां पर भी ऐसे ही बच्चे ने मम्मी का पल्लू खींचा। पर मम्मी पूरे इंतजाम से गईं थीं उन्होंने कुछ सिक्के निकाले चार-पांच बच्चों को बांट दिए। उन बच्चों को देखते ही मुङो दोबारा उस घूरने वाले बच्चे की याद आ गई। उसकी आंखों से आंखे मिलाना मेरे बस की बात नहीं थी सो मैंने अपनी निगाह नीची कर ली। हाल ही में भूख और कुपोषण पर जारी एक रिपोर्ट के आंकड़े देखकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आंखे भी शर्म से नीचे हो गइर्ं। दरअसल रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों की मानें तो आज भी देश में 42 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। सिंह ने बयान दिया कि यह तो ‘राष्ट्रीय शर्म’ की बात है। हालांकि उन्हें कितनी शर्म आई इसका आंकलन लगाना मुश्किल है। यह तो राष्ट्रीय रिपोर्ट थी सो शर्म भी राष्ट्रीय थी। एक और रिपोर्ट हाल ही में आई पर यह अंतरराष्ट्रीय थी ‘द इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस सोसाइटीज’ द्वारा जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक विश्व की 15 फीसदी आबादी भूखी है। इस विश्वव्यापी भूख को देखकर मुङो लैंगस्टन ह्यूज की कविता ‘भूखे बच्चे से ईश्वर’ की याद आ गई। जिसमें ईश्वर की व्यवस्था पर ही करारी चोट की गई है। ईश्वर भूखे बच्चे से कह रहा है कि मैंने यह दुनिया तुम्हारे लिए नहीं बनाई/ तुमने मेरी रेलवे में पूंजी नहीं लगाई/मेरे निगमों में पैसा नहीं लगाया / कहां हैं स्टैण्डर्ड आयल के शेयर तुम्हारे? मैंने अमीरों के लिए बनाई है यह दुनिया/ और उनके लिए जो अमीर होने वाले हैं/ और उनके लिए जो हमेशा से रहे हैं अमीर/ तुम्हारे लिए नहीं, भूखे बच्चे। लब्बोलुआब यह है कि यह दुनिया अमीरों के लिए है, किसी भूखे बच्चे या गरीबों के लिए नहीं। अब मुङो लगता है कि मेरी व्हिसलरी पर उस बच्चे का घूरना सही था। मेरा गुनाह था कि उस भूखे बच्चे के सामने मैंने 15 रुपए उस पानी में बहाए, जिसे मैं हैंडपम्प से मुफ्त में पा सकती थी। उस बच्चे के घूरने का मतलब था कि उसकी या यों कहें कि भूखे बच्चों की अदालत में मैं गुनहगार हूं। और अब मैं उस गुनाह को कबूल करती हूं।

घूरते भूखे बच्चे

एक बच्चे का घूरना मुङो अंदर तक झकझोर गया। मेरा गुनाह था कि मैंने उसे भीख देने से मना कर दिया था। कृशकाय वाला वह बच्च उघारा था। उसने मुझसे दो-एक रुपए की उम्मीद लगाई थी। लेकिन मैंने उसे भीख नहीं दी। क्योंकि इससे पहले मैं एक ऐसे ही बच्चे को एक सिक्का थमा चुकी थी। दरअसल हाल ही में अपनी मां को लेने मैं निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंची। समय पता किया तो गाड़ी तय समय से तकरीबन डेढ़ घंटे देर से आनी थी। मेरे घुमक्कड़ी मन ने वहां ठहरना मंजूर नहीं किया। और मैं निकल पड़ी आसपास का जायजा लेने। प्यास लगी सो पानी की बोतल लेने एक पुराने से होटल में पहुंची। पैसे निकाले ही थे कि एक बच्चे ने आकर मुङो हल्के से छुआ। मैं घूमी तो बच्चे ने मुङो उम्मीद भरी नजरों से देखा। पहले तो मैंने उसे नजरअंदाज करना चाहा। तर्क था कि भीख को बढ़ावा देना गुनाह है। कुछ देर ठिठकी। लेकिन उस नंगेबदन बच्चे को देखकर न जाने क्यों सिहरन से पैदा हुई। मेरे भीतर के तार्किक इंसान पर मेरे ही भीतर का दयालू इंसान हावी हो गया। उस वक्त मुङो पता चला कि वाकई हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी। और मैंने उसे दो रुपए का सिक्का दे दिया। अभी बोतल हाथ में आई भी नहीं थी कि एक दूसरे बच्चे ने मुङो हिलाया मानों कह रहा हो कि 15 रुपए बर्बाद न करो। होटल के बाहर हैंडपाइप से पानी पी लो। क्या बिगड़ जाएगा? हालांकि उसने केवल मुङो हिलाया भर था, कहा कुछ भी नहीं था। पर न जाने क्यों उसे देखते हुए ये सब बातें मेरे मन में आ गईं। मैंने उसे अनदेखा करना चाहा तो उसने मुङो फिर हिलाया। और कहा, भूख लगी है। उसने भी कपड़े नहीं पहने थे, दुबले-पतले से उस बच्चे को देखकर मुङो उसकी बात पर यकीन करने का मन कर रहा था। लेकिन बोतल लेकर मैंने अपना रास्ता पकड़ा और निकल ली। पीछे घूमकर देखा। या उस बच्चे की घूरती हुई आंखों ने मुङो बरबस ही पलटने पर मजबूर किया। पहले जो बच्च याचक नजर आ रहा था अब वह कुछ उग्र था। उसने मुङो हिकारत भरी नजरों देखा और कुछ गालियों जैसा ही दिया। मैंने पानी पीने के लिए बोतल खोली तो लगा वह बच्च फिर मुङो झकझोर रहा है कि लानत है तुम पर। अब मैं स्टेशन पहुंच चुकी थी, मैं। मम्मी का फोन आया कि कहां हो बिटिया मैं पहुंच गई हूं। मैंने उन्हें रिसीव किया। मम्मी के आने की खुशी में मैं सबकुछ भूल चुकी थी। उनकी विशेष फरमाइश पर हाल ही में उन्हें मैं कालकाजी मंदिर ले गई वहां पर भी ऐसे ही बच्चे ने मम्मी का पल्लू खींचा। पर मम्मी पूरे इंतजाम से गईं थीं उन्होंने कुछ सिक्के निकाले चार-पांच बच्चों को बांट दिए। उन बच्चों को देखते ही मुङो दोबारा उस घूरने वाले बच्चे की याद आ गई। उसकी आंखों से आंखे मिलाना मेरे बस की बात नहीं थी सो मैंने अपनी निगाह नीची कर ली। हाल ही में भूख और कुपोषण पर जारी एक रिपोर्ट के आंकड़े देखकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आंखे भी शर्म से नीचे हो गइर्ं। दरअसल रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों की मानें तो आज भी देश में 42 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। सिंह ने बयान दिया कि यह तो ‘राष्ट्रीय शर्म’ की बात है। हालांकि उन्हें कितनी शर्म आई इसका आंकलन लगाना मुश्किल है। यह तो राष्ट्रीय रिपोर्ट थी सो शर्म भी राष्ट्रीय थी। एक और रिपोर्ट हाल ही में आई पर यह अंतरराष्ट्रीय थी ‘द इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस सोसाइटीज’ द्वारा जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक विश्व की 15 फीसदी आबादी भूखी है। इस विश्वव्यापी भूख को देखकर मुङो लैंगस्टन ह्यूज की कविता ‘भूखे बच्चे से ईश्वर’ की याद आ गई। जिसमें ईश्वर की व्यवस्था पर ही करारी चोट की गई है। ईश्वर भूखे बच्चे से कह रहा है कि मैंने यह दुनिया तुम्हारे लिए नहीं बनाई/ तुमने मेरी रेलवे में पूंजी नहीं लगाई/मेरे निगमों में पैसा नहीं लगाया / कहां हैं स्टैण्डर्ड आयल के शेयर तुम्हारे? मैंने अमीरों के लिए बनाई है यह दुनिया/ और उनके लिए जो अमीर होने वाले हैं/ और उनके लिए जो हमेशा से रहे हैं अमीर/ तुम्हारे लिए नहीं, भूखे बच्चे। लब्बोलुआब यह है कि यह दुनिया अमीरों के लिए है, किसी भूखे बच्चे या गरीबों के लिए नहीं। अब मुङो लगता है कि मेरी व्हिसलरी पर उस बच्चे का घूरना सही था। मेरा गुनाह था कि उस भूखे बच्चे के सामने मैंने 15 रुपए उस पानी में बहाए, जिसे मैं हैंडपम्प से मुफ्त में पा सकती थी। उस बच्चे के घूरने का मतलब था कि उसकी या यों कहें कि भूखे बच्चों की अदालत में मैं गुनहगार हूं। और अब मैं उस गुनाह को कबूल करती हूं।

Saturday, January 14, 2012

सर्दियों में चुनावी सरगरमी

कड़ाके की सर्दी में हिलने-डुलने का मन नहीं करता। रात को एक बार रजाई में घुसे की फिर सुबह ही उठते हैं, घर से निकलना मानों सजा मालूम देता है। पर नौकरी पर तो जाना ही है, सो हिम्मत बांधकर शरीर को कपड़ों से लादकर निकलते हैं। लेकिन उत्तरप्रदेश में चुनावी चकल्लस ने इस बार की सर्दियों को गरम कर दिया है। जनता ऊहापोह में है कि मोहर किस पर लगाएं। अबकी किसे आजमाएं। उधर नेताओं की पेशानी पर भी बल पड़े हैं। कोई पार्टी अपना दागी नेताओं को निकाल कर अपना दाम साफ कर रही है तो कोई दल जातिगत समीकरण समीकरण को पुष्ट करने के लिए दरबदर किए इन नेताओं को गले लगा रहा है। कुल मिलाकर अफरा-तफरी का माहौल है। दल बदल-बदलकर नेतागिरी करने में पारंगत नेता इस बार भी अपना राजनीतिक धर्म निभा रहे हैं। सियासी चौसर में किसकी शह और किसकी मात होगी। कहना मुश्किल है। हालांकि चुनावी विशेषज्ञ भी अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ा रहे हैं। हालांकि पिछली बार के उत्तरप्रदेश के चुनावी नतीजों ने सबका गणित बिगाड़कर रख दिया था। मुद्दों की राजनीति तो कब की गुम हो गई है सो दलबदलू नेताओं को किसी भी दल में ठौर ढूंढ़ने में कोई संकोच नहीं होता। जहां कहीं भी मौका मिले, बस लपक लो। वैसे भी दलबदलुओं की खोजी नजर पैदा हुई गुंजाइशों को फौरन ताड़ लेती है। उधर पार्टियां भी ऐसे बिन पैंदी के लोटाओं की तलाश में रहती हैं जिन्हें केवल नेतागिरी करनी है, किसी भी पार्टी का बैनर उठाने में कोई परहेज नहीं होता। हर बार की तरह इस बार भी कुछ ऐसे ही दलबदल चल रहा है। ताजा मामला बाबू सिंह कुशवाहा का है। बसपा से कई आरोपों के चलते निकाले गए कुशवाहा को भाजपा ने लपक लिया। भाजपा की मंशा तो उनके जरिए पिछड़ा वर्ग की राजनीति चमकाने की थी लेकिन दांव उलटा पड़ गया और उनकी दागदार छवि की वजह से हंगाम बरप गया। पार्टी में ही दो धड़े हो गए। इतना हल्ला मचा कि भाजपा को फिलहाल उनकी सदस्यता स्थगित करनी पड़ी। लेकिन बसपा से दरबदर किए गए बादशाह सिंह और दद्दन मिश्र भाजपा उम्मीदवार हैं। अवधेश वर्मा पंचायत चुनाव में काफी कुख्याति बटोर चुके हैं। अपने परिवार के लोगों को जिताने के लिए विरोधियों का अपहरण करवाने से भी नहीं चूके थे। गौर करने की बात है कि उस वक्त भाजपा ने इस पर खूब चीख-पुकार की थी। लेकिन अब हाथी की पीठ से उतरकर ये लोग कमल की छांव में आ गए हैं। मुख्तार अब्बास नकवी वैसे ही पार्टी को गंगा का दर्जा दे चुके हैं लिहाजा किसी भी दागदार दामन को वो अपने में समाहित करने में सक्षम है। अब बात करें समाजवादी पार्टी की तो भले ही उन्होंने डीपी यादव को अपनी पार्टी में न लिया और अपने प्रवक्ता मोहन सिंह को पार्टी से बर्खास्त कर दिया हो लेकिन फैजाबाद में शशि-कांड में लिप्त रहे सजा उम्रकैद की सजा काटने वाले आनंद सेन के पिता मित्रसेन यादव सपा के उम्मीदवार हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि पुत्र के आरोपों को यह कहते हुए खारिज किया जा सकता है कि अब बेटा नालायक निकल गया तो क्या करें? हमें तो मतलब उम्मीदवार से है लेकिन मित्रसेन भी कबूतरबाजी के मामले आरोपित रहे हैं। जेल के जिंगलों के पीछे सजा काट चुके सजा काट चुके भगवान शंकर शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित की यह सजा एक छात्र के अपहरण कर बलात्कार का मामले में मिली थी। ये भी सपा के उम्मीदवार हैं। हालांकि जब सपा, भाजपा, बसपा और कांग्रेस का दामन साफ नहीं है तो फिर आरएलडी की बिसाद ही क्या है। लेकिन जब चर्चा निकली है तो जिक्र तो होगा ही सिखों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले हाजी याकूब कुरैशी का आरएलडी ने खुली बाहों से स्वागत किया। कुरैशी ने पैगंबर का काटरून बनाने वाले काटरूनिस्ट का सिर कलम करने वाले के लिए इनाम की घोषणा की थी। इन्हें बसपा से निकाला गया था। पूर्व बसपा विधायक शाहनवाज राणा जिन पर लड़कियों की किडनैपिंग और छेड़छाड़ का मामला था उन्हें भी बसपा में शरण मिल गई। आरएलडी की महासचिव और पूर्व मंत्री अनुराधा चौधरी की पार्टी से नहीं निभी तो वो सपा में आ गई हैं।

मां की नाभिनाल से जुड़े हम

सुबह-सुबह उठो! अक्सर देर से ही उठ पाती हूं। रात को देर से जो सोती हूं। दिनचर्या बिल्कुल बर्बाद हो गई है। पढ़ती हूं, नौकरी करती हूं। खाना बनाती हूं। दोनों वक्त का न सही। खाने में कई बार मैगी, पोहा और ब्रेड होता है। कपड़े धुलती हूं। जब सारे गंदे हो जाते हैं। एक-एक कर धुलती हूं। मतलब वो सारा काम करती हूं जो मेरी मां मेरे लिए करती थी। लेकिन बेसलीका होकर। ठंड में घर से निकलती हूं, गरम कपड़े पहनकर। पर कोई पीछे से आकर मेरा मफलर मुङो जबरदस्ती नहीं थमाता।
जब से नौकरी करने आई हूं ऐसे ही दिन कट रहे हैं। अलसी के लड्डू हालांकि मां घर से बनाकर सर्दी शुरू होने से पहले ही भेज देती हैं, लेकिन वो डिब्बे में रखे-रखे ही फेंक दिए जाते हैं। उनका स्वाद मुङो नहीं जंचता। लेकिन मां तो हाथ में थमाती थी जबरदस्ती खिलाती थीं। और प्यार से बोलती थीं कि सर्दी बहुत है। अलसी गरम होती है। मेवे के लड्डू, शुद्ध देशी घी में बने भी भेजती हैं, उनका स्वाद जंचता है, पर दफ्तर की हड़बड़ में कभी-कभार ही इन्हें खाने का ध्यान आता है। फोन पर वो मुङो बार-बार कहती हैं कि बिटिया सर्दी बढ़ गई है। कान ढककर रहना। दफ्तर से जल्दी आ जाया करो। दो बादाम भिगो दिया करो और सुबह खा लिया करो। मैं झल्लाकर बोलती हूं कि इतना वक्त मेरे पास नहीं होता। और दफ्तर कोई मेरे चाचा का है जो ठंड लगे तो भाग आओ। वो बुरा नहीं मानतीं और अपनी गरज जताते हुए फिर मुझसे कहती हैं। अरे बिटिया तुम जब रात में खाना खाया करो तो उसी वक्त एक कटोरी में बादाम भिगो दो और जब चाय बनाने जाओ तो खा लिया करो। अब मैं पिघल जाती हूं और कहती हूं कि अच्छा ठीक है खा लूंगी। और फिर सोचती हूं कि मां तो बुजुर्ग हैं उनका ख्याल कौन रखता होगा। मैं दोबारा शाम को फोन करती हूं उनसे पूछती हूं आप बादाम खाती हो? लड्डू तो बनाए हैं न अपने और पापा के लिए। वो मेरी बात को अनसुना कर फिर से वही राग अलापती हैं, तुम घर नहीं पहुंची अभी तक? बिटिया छुट्टी लेकर आ जाओ, बहुत ठंडी है। मुङो पता है कि वो सारी हिदायतें जो मां मुङो देती हैं वो खुद नहीं मानतीं। आज जब मैं फौजिया अबू खालिद की कविता ‘नाभि नाल पढ़ रही हूं तो मुङो मेरी मां याद आ रही है, फौजिया कहती हैं मेरी मां ने रेगिस्तान से एक डोर खींची रेत की /और उसे नत्थी कर दिया मेरी नाभि से/चाहे जितनी दूर चली जाऊं मैं/उस बाल्टी की तरह होती हूं/जो बेमतलब ही कोशिश किए जा रही है/कुएं के गहरे पानी में झलकते चांद को उठाने की। कुछ ऐसा ही आज मुङो लग रहा है जब दूर उनसे परदेस में सालों से अपने स्वतंत्र अस्तित्व की तलाश में भटक रही हूं। बचपन में जो जिस नाभि नाल से मैं मां से जुड़ी थी।
जन्म लेते वक्त दायी ने उसे काट दिया था लेकिन हकीकत में वो नाल कोई काट नहीं सकता। या कि डरती हूं उस नाल के कटने से। दूर सही पर सुकून है मेरी मां तो है। उनके बूढ़े हाथ किसी भी बला से बचाने में मुङो सक्षम नजर आते हैं। जब मैं रोज की जद्दोजहद से तंग आ जाती हूं। उदास होकर उनसे अपनी थकान साझा करती हूं तो वो बेहद दृढ़ होकर मुझसे कहती हैं कि मुङो पता बिटिया तुम बहुत तरक्की करोगी। मेरा आशीष तुम्हारे साथ है। एक दिन तुम अपनी मंजिल जरूर पाओगी। मुङो भरोसा है और मेरी थकान छू-मंतर हो जाती है। मैं फिर जुट जाती हूं अपने काम में। मुङो खुद पर नहीं उनके भरोसे पर भरोसा होता है। कल रात मेरी दोस्त की मां का फोन आया था, मैं उससे तस्दीक की कि क्या तुम्हारी मां भी वही सब बोलती हैं जो मेरी मां कहती हैं। मुङो अचम्भा हुआ कि उसकी मां बिल्कुल मेरी मां जैसी ही हैं, उन्हें भी चिंता सताती है कि उनकी बेटी को ठंड न लग जाए, वो भी उसे बार-बार घर आने को कहती हैं, मफलर पहनने को कहती हैं। पर जब वो करीब होती हैं तो एहसास ही नहीं होता कि उनका होना कितना कीमती है। फिर उन बच्चों को देखती हूं जो कड़ाके की ठंड में नंगे पैर चौराहों और भीड़ भरी सड़कों के बीच कभी पोस्टर बेचते हैं तो कभी फूल। कभी थालियों में भगवान की तस्वीरें रखकर आधे-अधूरे कपड़े पहनकर भीख मांगते हैं। शुक्र है दूर ही सही पर मेरी मां तो है।

Thursday, January 5, 2012

एक और गंगा मगर सियासी!

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी राष्ट्रीय पुष्प की तुलना राष्ट्रीय नदी से कर गए। नकवी की जुबान फिसल गई या फिर उनका सामान्य ज्ञान कम पड़ गया! क्या हुआ? ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। नकवी ने अपनी पार्टी की पवित्रता का बखान करते हुए उसकी तुलना गंगा से कर दी। हुआ यूं कि बसपा के दागी मंत्रियों को पार्टी में शामिल करने पर भाजपा की कढ़ी आलोचना हुई। खुद पार्टी ही इस मुद्दे पर दो धड़ों में बंट गई पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली और सुषमा स्वाराज को नितिन गणकरी का यह फैसला नहीं भाया। बसपा के दरबदर किए गए मंत्रियों को भाजपा में शामिल करने को लेकर उठ रहे सवालों को शांत करने के लिए नकवी सामने आए और उन्होंने कहा, कमल दल (भाजपा) गंगा जैसी पवित्र पार्टी है, जिसमें तमाम नाले आकर गिरते हैं। मगर इससे गंगा को कोई फर्क नहीं पड़ता। बसपा से बाहर किए गए राष्ट्रीय ग्रामीण मंत्री बाबू लाल कुशवाह और श्रम मंत्री बादशाह सिंह भाजपा में शामिल हो गए। हो-हल्ला मचा कि भ्राष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली पार्टी ने भ्रष्टाचारियों को अपने दल में कैसे शामिल कर लिया। कहने वालों ने यहां तक कह डाला कि भाजपा के वरिष्ठ एवं वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी एक तरफ भ्रष्टाचार विरोधी यात्र कर रहे हैं और दूसरी तरफ भ्रष्टाचारियों को पार्टी में शामिल किया जा रहा है। बसपा के पूर्व बाबू लाल कुशवाहा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में घोटालों और बहुचर्चित सीएमओ हत्याकांड में कथित तौर पर लिप्त हैं। बादशाह सिंह की बात करें तो इन्हें लोकायुक्त की सिफारिश पर पद दलित किया गया। इन पर भी पद का दुरुपयोग करने और भ्रष्टाचार जैसे संगीन आरोप हैं। सीबीआई दोनों मामलों की जांच कर रही है। मायावती अपनी पार्टी के दागी मंत्रियों को दरकिनार करने में लगी हैं। इससे पहले भी कई और मंत्री निकाले जा चुके हैं। मायावती अपनी पार्टी को साफ करने में लगी हैं। इससे पहले भी चार मंत्री वन मंत्री फतेह बहादुर सिंह, प्राविधिक शिक्षा राज्य मंत्री सदल प्रसाद, अल्प संख्यक कल्याण एवं हज राज्य मंत्री अनीस अहमद खान उर्फ फूल बाबू और मुस्लिम वक्फ राज्य मंत्री शहजिल इस्लाम अंसारी को तत्काल प्रभाव से मंत्रिमंडल से निष्कासित किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री ने इन मंत्रियों को इस्तीफा देने का मौका भी नहीं दिया। अगर संसदीय प्रक्रिया के जानकारों की मानें तो किसी मंत्रिमंडल से निष्कासिक करने से पहले मुख्यमंत्री पहले मंत्रियों से इस्तीफा देने को कहते हैं, इसके बाद अगर मंत्री अड़े रहें तो उन्हें बर्खास्त किया जा सकता है। इतना ही नहीं एक अन्य राज्य मंत्री ददन प्रसाद ने मौके की नजाकत को समझते हुए खुद ही इस्तीफा दे दिया। बसपा प्रमुख विधान सभा चुनावों से पहले अपनी पार्टी की सफाई करने में जुटी हैं। लेकिन भाजपा को क्या हो गया कि बसपा के दर बदर किए दागी मंत्रियों को अपने दामन में समेटने में लगी है। नकवी ने शायद इसी पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए कहा होगा कि भाजपा गंगा है। जैसे गंगा में कई नाले आकर गिरते हैं लेकिन गंगा की पवित्रता ज्यों की त्यों बनीं रहती है। गंगा किसी में भेदभाव नहीं करती। लोग पाप धुलने के लिए गंगा की शरण में जाते हैं, वैसे ही भाजपा में आकर सब पवित्र हो जाएंगे। अब चाहें कुशवाहा हों या फिर बादशाह सिंह क्या फर्क। लेकिन नकवी साहब को कौन समझाए कि पापियों के पाप धुलते-धुलते राम की गंगा मैली हो गई है! दो दशक से भी ज्यादा समय से गंगा की सफाई में सरकारी खजाने के हजारों करोड़ खर्च हो चुके हैं। देश की राष्ट्रीय समस्याओं में गंगा की सफाई शीर्ष पर है। ऐसे में नकवी साहब कमल दल से गंगा की तुलना करने में अड़े हैं।

Monday, December 26, 2011

क्यों छाए ‘अन्ना’ और ‘कोलावेरी डी’

इस साल दो चीजों ने मुङो रोमांचित किया। पहला ‘अन्ना का आंदोलन’ तो दूसरा ‘कोलवेरी डी’। दोनों में में कुछ बातें जो बिल्कुल सामान्य थीं, भाषा और प्रस्तुतिकरण। आंदोलन भ्रष्टाचार जैसे गुस्सा दिलाने वाले चिरपरिचित मुद्दे को केंद्र में रखकर खड़ा किया गया तो गाने में कोलावेरी डी जैसे आक्रमक बोल का प्रयोग। दोनों नाकारात्मक शब्दों का प्रयोग धैर्य जैसे साकारात्मक भावना के साथ और बगैर किसी विकृत भावभंगिमा के किया गया। एक तरफ जहां अन्ना ने लोगों से संयम बरतते हुए अपना आंदोलन चलाने की बात कही तो दूसरी तरफ तमिल गाने का नायक धनुष भी बगैर गुस्साए अपनी प्रेमिका से नाराजगी की वजह पूछता है। मतलब संवाद की पहली कसौटी सुलझी हुई और जनसामान्य की समझ में आने वाली भाषा। दोनों ही इस कसौटी पर खरे उतरे। अब जिन चेहरों को दोनों में सामने लाया गया वे भी कोई खास तरह के नहीं थे। पांच फुट दो इंच के अन्ना, सफेद पोशाक और गांधी टोपी पहने जिन्हें देखकर आमजन को सहज ही भरोसा हो गया कि ये नेतागिरी करने और अपना चेहरा चमकाने नहीं बल्कि जनता को जगाने और हमारे दर्द को साझा करने आए हैं। उनके भाषण किसी कुशल लेखक से कलमबद्ध नहीं कराए गए। जब उन्होंने मराठी मिश्रित हिंदी में कहा ‘मुङो आप लोगों से ऊर्जा मिल रही है, आपके उत्साह से मुङो उत्साह मिल रहा है’..‘हो सकता है वो लोग मुङो उठा ले जाएं पर हिंसा मत करना’। शायद अन्ना ये न बोलते तो जैसी प्रतिक्रिया सरकार की तरफ से हो रही थी ऐसे में आंदोलन उग्र हो जाता। लोगों को समझ में आया कि अन्ना हमें केवल उकसाने नहीं आए हैं। अब कुछ ऐसा ही कोलावेरी डी के धनुष ने भी किया, लल्लनटॉप टाइप वेशभूषा धारण न करके एक आम प्रेमी की तरह वो दुखी होकर प्रेमिका से गुस्से की वजह पूछते हैं। सही बात तो यह है कि गाने में कोई राग भी नहीं। इस गाने की आलोचना करने वालों ने इसे बगैर सुर ताल का अलाप करार दिया। जैसे अन्ना के भाषण को सुगढ़ बनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया वैसे ही गाने में बस बोल को तवज्जो दी गई। चार सेकेंड के गाने में 34 बार कोलावेरी डी का प्रयोग किया गया। इस मुहिम में भी अन्ना और उनके सहयोगियों ने भी लगातार लोगों के मन में एक बात पुष्ट करने की कोशिश की कि अन्ना भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात कर रहे हैं। मैंने उस दौरान कई लोगों से जब इस बारे में पूछा तो उन्हें लोकपाल के बारे में कोई खास जानकारी नहीं थी, लेकिन उन्हें पता था कि अन्ना भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए अड़े हैं। इसलिए हम उनके साथ हैं। अब आखिर में बात करें इन दोनों के प्रचार की। तो निसंदेह दोनों की मार्केटिंग में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। मीडिया ने अन्ना को कवरेज दिया और दिल खोलकर दिया। या यों कहें कि मीडिया के पास उस वक्त उससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं था। उधर कोलावेरी डी पर भी मीडिया की इनायत रही। हिंदी और इंग्लिस मीडिया दोनों ने संपादकीय से लेकर अन्य लेख इस पर लिखे। फर्क नहीं पड़ता की आलोचनात्मक या फिर विश्लेषणात्मक। अन्ना और कोलावेरी डी की चर्चा इतनी हुई कि लोग इनका मतलब भले ना जाने या जानें भी, लोगों की जुबान पर यह शब्द इतना चढ़। चेतन-अवचेतन मन में एक छवि बन गई। दूसरी बात देश की पूरी जनसंख्या का एक तिहाई युवा है। जिसे आक्रामकता भाती है, जो जिद्दी लोगों को पसंद करता है। जो तब तक अड़ा रहता है जब तक कि उसे उसके सवाल का जवाब न मिल जाए। धनुष अपनी प्रेमिका से बार-बार पूछते हैं कि तुम आखिर इतनी नाराज क्यों हो? वाए दिस कोलावेरी डी? फिर बताते हैं कि उनकी प्रेमिका देखने में कैसी है, फिर अपना हाल-ए-दिल बयान करते हैं, लेकिन उनके जहन में बस एक ही बात और एक ही लक्ष्य है कि उनकी प्रेमिका इतना नाराजा क्यों है। कैसे उसकी नाराजगी का पता लगाएं। अन्ना भी अड़ियल हैं, जिद्दी हैं, वो बस एक बात पर अड़े हैं कि लोकपाल लाओ। दरअसल सफल संवाद के लिए सामने वाले के मनोविज्ञान को समझना बेहद जरूरी है। दोनों के पीछे की टीमों ने इसे बखूबी समझा। नयापन, रोमांच, दृढ़ता और लक्ष्य केंद्रित होना इनके लोकप्रिय होने की अहम वजह रहीं।