Monday, October 29, 2012

दलित औरतों पर दोहरी मार हरियाणा में हिसार के डाबरा गांव में इन दिनों सन्नाटा पसरा है। यहां के एक दलित परिवार के मुखिया कृष्णा ने अपनी बेटी के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद अपनी जान दे दी। यह मामला अभी सुलझा भी नहीं था कि करीब के दूसरे गांव में अगड़ी जातियों के कुछ दबंगों ने तीस वर्षीय दलित महिला के घर में घुसकर दिनदहाड़े उसका बलात्कार किया। दिल्ली से सटे हुए हरियाणा में दलित महिलाओं के साथ इस तरह की घटनाएं हो रहीं हैं तो शहर से दूर ग्रामीण इलाकों में क्या हो रहा होगा इसका अंदाजा खुद ही लग जाता है? दोनों घटनाएं एक ही महीने के भीतर बेहद कम अंतर में घटी तो देश की राजधानी दिल्ली तक खलबली मच गई। लेकिन इसी बीच उत्तर प्रदेश के सीतापुर में भुदावां के पिसांवा गांव में दो औरतों का भी बलात्कार हुआ। दोनों औरतें दलित थीं लेकिन मामला इतना चर्चित नहीं हुआ, शायद इसकी वजह इस गांव का शहर से दूरदराज किसी कोने में बसे होना है।सभी मामलों में आरोपी उच्च जातियों के हैं। ये घटनाएं तो वो हैं जो जैसे-तैसे हम तक पहुंच गईं। लेकिन ज्यादातर मामले तो दबकर ही रह जाते हैं। महिलाएं और दलित दोनों ही समाज में अलग-थलग पड़े समुदाय हैं। केवल औरतों की बात करें तो समाज में इन्हें दूसरा दर्जा ही मिला है। आंकड़े भी यही कहते हैं, महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर रही एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘थॉमसन रायटर्स ट्रस्ट लॉ’ की इसी वर्ष आई रिपोर्ट की मानें तो पिछले साल देश में चौबीस हजार दो सौ छह बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे। इसी रिपोर्ट में दूसरा चौंकाने वाला आंकड़ा है कि जहां एक तरफ देश में स भी तरह के अपराध हर साल 16 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं वहीं महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले 31 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं। दोनों ही रिपोर्टों को जोड़कर देखें तो ‘दलित उस पर भी महिला’ होने की तस्वीर स्पष्ट होती है। जरा बात करें दलितों के लिए बने कानून की, तो 1989 में ही एससी/एसटी,अत्याचार निरोधक कानून बनाया जा चुका है। जिसमें दलितों के साथ किसी भी तरह के भेदभाव और अत्याचार करने वालों के लिए कठोर सजा तय की गई है। इसमें भी ‘दलित महिलाओं को सम्मान से जीने और सुरक्षा के अधिकार’ में रुकावट पैदा करने वाले पर अलग से कानूनी कार्रवाई करने का स्पष्ट आदेश है। इतने गं भीर मामलों में पंचायतों की क्या भूमिका यह देखना भी जरूरी है। ग्रामीण जनता के सबसे करीब प्रशासन की इकाई की बात करें तो वो हैं पंचायतें। कानूनी तौर पर पंचयातों के लिए स्पष्ट आदेश है कि गांव में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा और उनके सम्मान से जीने के अधिकार की रक्षा करना पंचायत की ही जिम्मेदारी है। लेकिन असल में पंचायतें उच्च जातियों के हाथों की कठपुतली हैं। हिसार के डाबरा गांव में दलित लड़की के साथ हुए बलात्कार के मामले को लड़की के बाप ने सबसे पहले पंचायत में ही उठाया था। लेकिन वहां से मदद मिलने की बजाए, झिड़की और चुप बैठने की सलाह मिली। नतीजा सबके सामने है। निराशा से घिरे बाप ने मौत को गले लगा लिया। बलात्कार, फिर बाप की मौत से लड़की ही नहीं पूरा दलित समुदाय दहशत में है।
अंधेरे को रोषनी का इंतजार ‘‘हमार पुरवा मा कब उजियारा होई ?’’ लगभग अधेड़ हो चुके उत्तर प्रदेष के जिला चित्रकूट के भभई गांव में चुनकी का पुरवा के मुन्नी लाल का सवाल दरअसल अधिकतर ग्रामीण आबादी का है। सरकारी आंकड़े भी देष की इस अंधेरी तस्वीर के गवाह हंै। 2011 की जनगणना के मुताबिक तकरीबन 55 प्रतिषत गांवों में बत्ती नहीं पहुंची है। देष की करीब सत्तर प्रतिषत आबादी गांवों में बसती है। और आज भी देहातों के आधे से ज्यादा घरों में कैरोसिन का दिया जलता है। मार्च, 2005 में षुरू हुई राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत पांच सालों के भीतर सौ प्रतिषत गांवों को रोषन करने की योजना बनाई गई थी। मजेदार बात यह है कि हम इसके कागजी आंकड़े भी नहीं जुटा पाए। इस योजना की सबसे बड़ी खासियत गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) और पिछड़ी जाति के लोगों को मुफ्त बिजली देना था। लेकिन इस मोर्चे पर तो हम नाकाम ही रहे। क्योंकि जिन गांवों में बिजली पहुंच भी गई है वहां की अधिकतर दलित बस्तियां अंधेरे में ही हैं। उत्तर प्रदेष के महोबा के रैपुरा कलां, छानी कलां बनारस के मेहदीगंज की मुसहर बस्ती, धरसौना, की दलित बस्ती। सूची लंबी है। कहीं खंभे हैं तो कहीं खंभे भी नहीं है। असल में सरकारी आंकड़ों में खंभे गाड़ने भर से मान लिया जाता है कि बिजली पहुंच गई है। ऐसे में बिजलीकरण से ज्यादा योजना खंभाकरण की लगती है। यानी सरकारी आंकड़ों की जमीनी स्तर पर पड़ताल करें तो यहां अंधेरा नहीं बल्कि घुप अंधेरा नजर आएगा। ये तस्वीर केवल उत्तर प्रेदेष की नहीं बल्कि देष के सभी गांवों की है। तीस जुलाई को देष के 19 राज्यों में अचानक एक साथ बिजली चली गई। इनमें से अधिकांष इलाके षहरी थे सो जमकर हो - हल्ला कटा। प्रदर्षन हुए, तोड़फोड़ हुई। सरकार हरकत में आ गई और कुछ घंटों में ही संकट खत्म हो गया। सोचो कुछ घंटों का अंधेरा षहरी जनता को बेचैन कर गया तो फिर गांवों में छाया लंबे समय से घुप अंधेरा क्या उन्हें काटने को नहीं दौड़ता होगा ?

Monday, July 30, 2012

तिवारी जी,

एन डी तिवारी बधाई हो आप बाप बन गए। आपको तो रोहित का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने 87 वर्ष की उम्र में पिता होने का एहसास करवाया। बाप बनाम बेटे की लड़ाई से एक बात तो साफ हो गई कि बाप एक नंबरी तो बेटा दस नंबरी निकला। जिद्दी बेटे ने गुरुर से भरे बाप को झुका ही दिया। हालांकि इस पूरे ड्रामें एक बात जिस पर किसी का ध्यान नहीं गया वह यह कि एक बेटे ने अपनी मां का साथ ऐसे मामले में दिया जिसे अक्सर हमारे समाज में कलंक कहा जाता है। बहुत खड़ी भाषा में बोलें तो ऐसी औरत के लिए लोग अक्सर कह देते हैं कि जवानी में रंगरलियां मनाईं हैं तो अब भुगतो नतीजा। अक्सर ऐसी मां के बेटे भी अपनी मां को हो दोषी मानते हैं लेकिन यहां रोहित ने अपनी मां को इंसाफ दिलाया। एक ऐसे व्यक्ति को कठघरे में खड़ा कर दिया जो राजनीति में मजबूती के साथ स्थापित था। इस पूरी लड़ाई के दौरान रोहित को क्या-कुछ नहीं सहना पड़ा होगा? ये बताने की जरूरत नहीं है। परिवार, दोस्तों और समाज से उसे कई तरह के ताने मिले होंगे। हालांकि अगर ढूढ़ां जाए तो ऐसी कई कद्द्दावर शख्सियतें होंगी जो कई बेटे-बेटियों के जैविक पिता या हो सकता है कि ऐसी मांएं भी हों। लेकिन उनके खिलाफ लड़ने की हिम्मत किसी में भी नहीं होती। उज्जवला को फक्र होगा कि उसने रोहित को पैदा किया। तिवारी जी गुस्सा तो बहुत आ रहा होगा। लेकिन आप कर भी क्या सकते हैं निगोड़ी विज्ञान ने आपका भांडाफोड़ कर दिया। पर अब इतनी छीछालेथन के बाद जब आप बाप बन ही गए हैं तो सरेआम आकर मान लीजिए, गल्तियां किससे नहीं होती? बधाई हो रोहित और उससे भी ज्यादा। बधाई हो उज्जवला को जिसने रोहित जैसा बेटा पाया

Wednesday, July 25, 2012

मर्द की बपौती है, रासलीला

पिछले दो दिनों से मैं लगातार एक सवाल से जूझ रही हूं कि आखिर परंपराओं को निभाने और संस्कृति को कायम रखने का जिम्मा स्त्री का ही क्यों है? पुरुष और स्त्री के चरित्र की बात करते वक्त हम अलग-अलग चश्मा क्यों पहन लेते हैं? एक स्त्री अपने मनमुताबिक जिंदगी जीती है तो समाज उसे नामंजूर कर देता है। रासलीला तो कान्हा करते थे, राधा नहीं। मतलब रासलीला मर्द की बपौती है, औरत तो मीरा, सीता या फिर राधा हो सकती है। हालांकि यहां समाज भी दो हिस्सों में बंटा है। एक समाज वो जो उसी औरत के बिंदास और बेबाक रवैए का लुत्फ उठाता है। यह होता है युवा समाज, बुड्ढा समाज भी, अधेड़ समाज भी। इस समाज में केवल महिलाएं और अधिकांश बच्चे नहीं होते। और दूसरा समाज जिसमें इन सबके अलावा हर उम्र और वर्ग की महिलाएं भी शामिल होती हैं। यह समाज औरत के इस खुलेपन को परंपरा और संस्कृति के खिलाफ समझता है। चुभने वाली बात तो यह है कि वह पुरुष समाज भी इस तथाकथित पारंपरिक समाज की राय को पुख्ता करता है जो उस महिला के खुलेपन का केवल साझीदार होता है। जब खुलेपन की बात करते हैं तो कपड़े पहनने से लेकर मौज-मस्ती और खासतौर पर स्त्री-पुरुष के बीच शारीरिक संबंधों को शामिल किया जाता है। वैसे तो हमेशा से ही मेरे भीतर यह सारे सवाल सुलगते रहते हैं, लेकिन होमी अदजानिया द्वारा निर्देशित फिल्म ‘कॉकटेल’ को देखने के बाद तो इन सवालों से मानों लपटें सी उठनी लगीं हैं। कहानी अच्छी थी या बुरी। यह फिल्म समीक्षकों की चिंता है। लेकिन मैं बस फिल्म के तीन पात्र वेरोनिका, मीरा और गौतम की बात करूंगी। वेरोनिका बिंदास, अत्याधुनिक खुले विचारों वाली लड़की, जो कपड़ों को लेकर परंपरावादी नहीं है। जहां तक स्त्री-पुरुष के संबंध हैं उनमें बेहद खुली हुई। सेक्स उसके लिए रोजमर्रा की चीज है। गौतम भी बिल्कुल वैसा ही है। दोनों में खूब पटती है। दोनों अच्छे दोस्त हैं। साथ रहते हैं। दोनों एक बराबर बिस्तर साझा करते हैं। दोनों शादी को बोरिंग समझते हैं। परिवार उन्हें ऊबाता है। मतलब दोनों एक दूसरे का वाइस वर्सा हैं या कहें कि वेरोनिका और गौतम को अगर एक दूसरे से बदलें तो बस फर्क केवल औरत और मर्द होने का होगा। वहीं दूसरी तरफ मीरा परंपरावादी, संस्कृतिवान, ढकी-मुदी। उसके लिए परिवार घर ही सब कुछ है। शादी उसके लिए एक सलोना सपना है। यानी बिल्कुल वैसी जैसी कि भारतीय समाज में आम तौर पर लड़कियां होती हैं। कुछ भी अलग नहीं। लेकिन वेरोनिका की एक और खास बात है जो न तो गौतम में है और न हीं मीरा में। उसमें निर्णय लेने की क्षमता गजब की है। वह एक अनजान लड़की मीरा को अपने घर लेकर आती है। बगैर किसी स्वार्थ उसे अपने साथ अपनी खास सहेली की तरह रखती है। उसके आंसू पोछती है। खासकर फिल्म का वह संवाद जब मीरा वेरोनिका का खाली दूध का गिलास उससे मांगती है तब वह कहती है कि तुम नौकर नहीं हो जो.. लेकिन निर्देशक और उससे भी ज्यादा दर्शकों और समीक्षकों ने इस पूरे हिस्से को हासिए पर ही ला दिया। क्यों? क्या चरित्र को ठोस आधार देने में यह वाकया भी दर्ज नहीं होना चाहिए। यह किरदार को अन्य दो किरदारों के सामने बेहद भारी बनाता है। लेकिन आखिर में गौतम मीरा को चुनता है। मीरा भी गौतम के प्यार में गिरफ्तार हो जाती है। वेरोनिका रोती बिलखती है और फिर वह खुशी-खुशी उन दोनों की जोड़ी बना देती है। मतलब वेरोनिका स्त्री सो उसे परंपराएं तोड़ने और संस्कृति को बर्बाद करने की सजा और गौतम पुरुष सो उसे तो मिला मजा। यानी वेरोनिका और मीरा दोनों। और मीरा जो वेरोनिका की सबसे अच्छी दोस्त वह भी गौतम को खुली बाहों से अपनाती है। क्योंकि मर्द करे तो रासलीला, औरत करे तो कैरेक्टर ढीला। दुहाई है ऐसे समाज की और बलिहारू जाऊं मीरा की जो गौतम के चरित्र को अनदेखा कर उसे देवता बनाकर अपने मनमंदिर में स्थापित करती है।

Tuesday, April 17, 2012

कोलकाता की ‘हिटलर दीदी’

पश्चिम बंगाल की ममता दीदी इन दिनों पूरे देश की सुर्खियां बटोर रही हैं। केंद्र की सियासत में तो गाहे बगाहे अपना रुतबा दीखा ही देती हैं, इसके इतर राज्य में भी उनके फैसले चर्चा का विषय बने हुए हैं। अब देखिए न हालिया फरमान उनका सख्त होने के साथ ही रोचक भी है। उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी यानी तृणमूल के किसी भी कार्यकत्र्ता का संबंध किसी भी स्तर पर उनकी धुर विरोधी पार्टी सीपीएम से नहीं होना चाहिए। तृणमूल की नेता एवं खाद्य आपूर्ति मंत्री ज्योतिप्रिय मलिक ने दीदी के संदेश को कुछ इस तरह से पहुंचाया। ‘सीपीएम के साथ किसी भी तरह की रिस्तेदारी न बनाएं। यदि आप विरोधी पार्टी के किसी नेता से चाय की दुकान पर भी मिलते हैं तो उनसे बातचीत मत करिए। हमने सीपीएम के सामाजिक बहिष्कार की कसम खाई है। आपको यकीन दिलाना होगा की आप हमारी विपक्षी पार्टी के किसी नेता के परिवार से अपने परिवार के किसी व्यक्ति का वैवाहिक संबंध भूलकर भी नहीं होने देंगे।’ मेरी चिंता तो केवल इतनी है कि अगर दोनों परिवारों के बच्चों के बीच इश्क-विश्क का चक्कर चल गया तो फिर क्या होगा? खैर अब पार्टी कार्यकत्र्ता अपने बच्चों को पार्टी प्रमुख की हिदायत से वाकिफ करा ही देंगे। चिंता ये भी है कि सीपीएम पार्टी कार्यकत्र्ता और तृणमूल के लोगों को बीच अगर पहले से ही कोई संबंध हुआ तो? शायद ऐसा होने पर संबंध विच्छेद करने की हिदायत दी जाएगी। इन दिनों एक टीवी सीरियल काफी चर्चि हो रहा है, हिटलर दीदी। हो सकता है उसे दीदी से ही प्रेरणा मिली हो। यह मेरे निजी विचार हैं और अक्सर जैसा होता आया है कि निजी विचार में तथ्यों की जगह आत्मनिष्ठता हावी रहती है। उनके इस तुगलकी फरमान से साफ हो गया है कि दीदी के दामन को पकड़कर राजनीति करने के इच्छुक लोगों को दीदी के द्वारा बनाए गए दायरे तक ही सीमित रहना होगा। हाल ही में कोलकाता में एक और घटना घटी। जिसने ममता को कठोर होने पर मजबूर कर दिया। जादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने ममता दी के कुछ काटरून नेट पर डाल दिए। बस क्या था दी के कार्यकत्र्ताओं ने कर दी पिटाई। खैर, पुलिस ने दोनों को पकड़कर सलाखों के पीछे डाल दिया। अब वो बात अलग है कि कार्यकत्र्ता 500-500 का मुचलका देकर बरी हो गए। और बेचारे प्रोफेसर साहब को पूरी रात जेल में काटनी पड़ी। लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं कि दीदी तानाशाह हो गई हैं। लेकिन मेरा मानना कुछ और ही है। दरअसल दीदी लोकतंत्र का दायरा बनाने की कोशिश कर रही हैं। समाज में बराबरी लाने के लिए प्रयासरत हैं। तभी तो प्रोफेसर और उन्हें पीटने वाले कार्यकत्र्ता दोनों पकड़े गए। छोड़ने का वक्त अलग-अलगा था तो क्या? इतना तो चलता है। उनके साथ ट्रीटमेंट भी अलग हुआ होगा। इतना भी चलता है। दूसरी तरफ दीदी का एक और फैसला जो लोकतंत्र के हिमायतियों को कुछ अखर रहा है वो ये कि उन्होंने कार्ल मार्क्‍स को स्कूली पाठ्यक्रम से हटाने का प्रस्ताव रखा है। यहां भी दीदी का सोचना शायद यह हो की स्कूली बच्चों के मन मस्तिष्क में किसी भी विपरीत चिंतन के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। अब मार्क्‍स को पढ़ेंगे तो समाज के वर्गो में द्वंद्व पैदा होगा। जो कि विकास के लिए ठीक नहीं है। अब दीदी बड़ी हैं जो सोचा होगा समझकर ही सोचा होगा। दिनेश त्रिवेदी का मामला भी सबको पता ही है। नौ साल बाद किराया बढ़ाने पर उन्हें पद छोड़ना पड़ा।

Saturday, March 24, 2012

बर्फ पिघलने की कामना...

खुशकिस्मत है वो सास जिसे अच्छी बहू मिल जाए। इस मामले में मेरी किराएदारिन बड़ी भाग्यशाली हैं। एक तो बहू कमाऊ है ऊपर से स्वाभाव भी बहुत अच्छा है। आज ही सुबह मिली तो कह रही थी आंटी बस अब कुछ दिन ही तो आपके साथ हैं। डेढ़ करोड़ की कोठी खरीदी है। खरीदें भी क्यों न लड़का-बहू दोनों कमाऊ हैं। पति की अच्छी खासी जॉब है। अपने लड़के के लिए मैं बस ऐसी ही बहू चाहती हूं। दरअसल बस में बैठी तीन महिलाएं बहू चर्चा में तल्लीन थीं। तीनों संभ्रांत परिवार से थीं। उनमें से एक महिला जो कुछ अधेड़ थी, ने अपने लिए बिल्कुल वैसी ही पुत्र वधू की कामना की जैसी उनकी किराएदारिन की है। अंतिम वाक्य पूरा करते-करते उनकी सांस कुछ लंबी और आंखें ऊपर को हो गईं थीं। मानों ईश्वर से किसी गंभीर वरदान की कामना कर रही हों। अब स्पष्ट ये नहीं था कि बहू का सीधा-सरल स्वाभाव संभावित सास को भाया या उसके ऊंचे ओहदे की नौकरी। हो सकता है दोनों का मिला-जुला असर हो। पर सुकून वाली बात यह है कि चिरकाल से सास रूपी प्रजाति और बहू रूपी प्रजाति के बीच जारी शीत युद्ध में कुछ गर्माहट का एहसास हुआ। लगता है दोनों के बीच जमीं बर्फ पिघलने लगी है। ईश्वर करे कि इन तीन महिलाओं की बात दूर तलक जाए। हर सास के जहन में उतरे और इस रिस्ते में मिसरी घोले। संभावित बहू होने के नाते मेरा भी दायित्व बनता है कि मैं अपनी प्रजाति के बीच इस संदेश को फैलाऊं। और बताऊं कि सांसे अब बहुओं पर शासन नहीं बल्कि उनसे सामंजस्य बनाना चाहती हैं। उन तीनों में से एक महिला जो बामुश्किल तीन-चार साल पहले ही बहू बनीं थी। इस चर्चा में उसकी टिप्पणी भी दर्ज करने लायक है। मेरी सास और मेरे बीच में कभी कोई खटर-पटर नहीं होती। जब मम्मी गांव चली जातीं हैं तो मैं तो बिल्कुल परेशान हो जाती हूं। ये तो सारा दिन बाहर रहते हैं और मैं अकेली खटती रहती हूं। मम्मी से बड़ा सहारा है। बेटे की देखभाल भी बिल्कुल अच्छी तरह होती है। अब यहां भी वही सवाल उठता है जो ऊपर उठा था कि मम्मी के काम का सहारा है या फिर मम्मी का साथ सुहाता है। लेकिन बात जो भी हो यह टिप्पणी दुनिया के सबसे ज्यादा चर्चित रिस्ते के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यह बयान आधिकारिक तौर पर उस महिला ने दिया जो हालिया बहू बनी है और उसके सास बनने की पृष्ठभूमि बन चुकी है। क्योंकि उसके बेटा हो चुका है। तीसरी महिला निर्विकार भाव से दोनों को सुन रही थी। मानों इस ऐतिहासिक बदलाव की प्रत्यक्षदर्शी बन कर इतिहास के पन्नों में दर्ज होना चाहती हो। और मैं सोच रही थी, पर्यावरण के लिहाज से भले ही ग्लेशियरों का पिघलना खतरनाक हो। कई सारी आपदाओं को न्यौता हो। लेकिन इस संबंध में अब गर्माहट आना बेहद जरूरी है। दोनों पक्षों के मन में बन चुके ग्लेशियर जितनी जल्दी पिघलें उतना अच्छा होगा। व्यक्ति, घर, परिवार और समाज के लिए।

Thursday, February 2, 2012

घूरते भूखे बच्चे

एक बच्चे का घूरना मुङो अंदर तक झकझोर गया। मेरा गुनाह था कि मैंने उसे भीख देने से मना कर दिया था। कृशकाय वाला वह बच्च उघारा था। उसने मुझसे दो-एक रुपए की उम्मीद लगाई थी। लेकिन मैंने उसे भीख नहीं दी। क्योंकि इससे पहले मैं एक ऐसे ही बच्चे को एक सिक्का थमा चुकी थी। दरअसल हाल ही में अपनी मां को लेने मैं निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंची। समय पता किया तो गाड़ी तय समय से तकरीबन डेढ़ घंटे देर से आनी थी। मेरे घुमक्कड़ी मन ने वहां ठहरना मंजूर नहीं किया। और मैं निकल पड़ी आसपास का जायजा लेने। प्यास लगी सो पानी की बोतल लेने एक पुराने से होटल में पहुंची। पैसे निकाले ही थे कि एक बच्चे ने आकर मुङो हल्के से छुआ। मैं घूमी तो बच्चे ने मुङो उम्मीद भरी नजरों से देखा। पहले तो मैंने उसे नजरअंदाज करना चाहा। तर्क था कि भीख को बढ़ावा देना गुनाह है। कुछ देर ठिठकी। लेकिन उस नंगेबदन बच्चे को देखकर न जाने क्यों सिहरन से पैदा हुई। मेरे भीतर के तार्किक इंसान पर मेरे ही भीतर का दयालू इंसान हावी हो गया। उस वक्त मुङो पता चला कि वाकई हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी। और मैंने उसे दो रुपए का सिक्का दे दिया। अभी बोतल हाथ में आई भी नहीं थी कि एक दूसरे बच्चे ने मुङो हिलाया मानों कह रहा हो कि 15 रुपए बर्बाद न करो। होटल के बाहर हैंडपाइप से पानी पी लो। क्या बिगड़ जाएगा? हालांकि उसने केवल मुङो हिलाया भर था, कहा कुछ भी नहीं था। पर न जाने क्यों उसे देखते हुए ये सब बातें मेरे मन में आ गईं। मैंने उसे अनदेखा करना चाहा तो उसने मुङो फिर हिलाया। और कहा, भूख लगी है। उसने भी कपड़े नहीं पहने थे, दुबले-पतले से उस बच्चे को देखकर मुङो उसकी बात पर यकीन करने का मन कर रहा था। लेकिन बोतल लेकर मैंने अपना रास्ता पकड़ा और निकल ली। पीछे घूमकर देखा। या उस बच्चे की घूरती हुई आंखों ने मुङो बरबस ही पलटने पर मजबूर किया। पहले जो बच्च याचक नजर आ रहा था अब वह कुछ उग्र था। उसने मुङो हिकारत भरी नजरों देखा और कुछ गालियों जैसा ही दिया। मैंने पानी पीने के लिए बोतल खोली तो लगा वह बच्च फिर मुङो झकझोर रहा है कि लानत है तुम पर। अब मैं स्टेशन पहुंच चुकी थी, मैं। मम्मी का फोन आया कि कहां हो बिटिया मैं पहुंच गई हूं। मैंने उन्हें रिसीव किया। मम्मी के आने की खुशी में मैं सबकुछ भूल चुकी थी। उनकी विशेष फरमाइश पर हाल ही में उन्हें मैं कालकाजी मंदिर ले गई वहां पर भी ऐसे ही बच्चे ने मम्मी का पल्लू खींचा। पर मम्मी पूरे इंतजाम से गईं थीं उन्होंने कुछ सिक्के निकाले चार-पांच बच्चों को बांट दिए। उन बच्चों को देखते ही मुङो दोबारा उस घूरने वाले बच्चे की याद आ गई। उसकी आंखों से आंखे मिलाना मेरे बस की बात नहीं थी सो मैंने अपनी निगाह नीची कर ली। हाल ही में भूख और कुपोषण पर जारी एक रिपोर्ट के आंकड़े देखकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आंखे भी शर्म से नीचे हो गइर्ं। दरअसल रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों की मानें तो आज भी देश में 42 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। सिंह ने बयान दिया कि यह तो ‘राष्ट्रीय शर्म’ की बात है। हालांकि उन्हें कितनी शर्म आई इसका आंकलन लगाना मुश्किल है। यह तो राष्ट्रीय रिपोर्ट थी सो शर्म भी राष्ट्रीय थी। एक और रिपोर्ट हाल ही में आई पर यह अंतरराष्ट्रीय थी ‘द इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस सोसाइटीज’ द्वारा जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक विश्व की 15 फीसदी आबादी भूखी है। इस विश्वव्यापी भूख को देखकर मुङो लैंगस्टन ह्यूज की कविता ‘भूखे बच्चे से ईश्वर’ की याद आ गई। जिसमें ईश्वर की व्यवस्था पर ही करारी चोट की गई है। ईश्वर भूखे बच्चे से कह रहा है कि मैंने यह दुनिया तुम्हारे लिए नहीं बनाई/ तुमने मेरी रेलवे में पूंजी नहीं लगाई/मेरे निगमों में पैसा नहीं लगाया / कहां हैं स्टैण्डर्ड आयल के शेयर तुम्हारे? मैंने अमीरों के लिए बनाई है यह दुनिया/ और उनके लिए जो अमीर होने वाले हैं/ और उनके लिए जो हमेशा से रहे हैं अमीर/ तुम्हारे लिए नहीं, भूखे बच्चे। लब्बोलुआब यह है कि यह दुनिया अमीरों के लिए है, किसी भूखे बच्चे या गरीबों के लिए नहीं। अब मुङो लगता है कि मेरी व्हिसलरी पर उस बच्चे का घूरना सही था। मेरा गुनाह था कि उस भूखे बच्चे के सामने मैंने 15 रुपए उस पानी में बहाए, जिसे मैं हैंडपम्प से मुफ्त में पा सकती थी। उस बच्चे के घूरने का मतलब था कि उसकी या यों कहें कि भूखे बच्चों की अदालत में मैं गुनहगार हूं। और अब मैं उस गुनाह को कबूल करती हूं।