Saturday, January 14, 2012

सर्दियों में चुनावी सरगरमी

कड़ाके की सर्दी में हिलने-डुलने का मन नहीं करता। रात को एक बार रजाई में घुसे की फिर सुबह ही उठते हैं, घर से निकलना मानों सजा मालूम देता है। पर नौकरी पर तो जाना ही है, सो हिम्मत बांधकर शरीर को कपड़ों से लादकर निकलते हैं। लेकिन उत्तरप्रदेश में चुनावी चकल्लस ने इस बार की सर्दियों को गरम कर दिया है। जनता ऊहापोह में है कि मोहर किस पर लगाएं। अबकी किसे आजमाएं। उधर नेताओं की पेशानी पर भी बल पड़े हैं। कोई पार्टी अपना दागी नेताओं को निकाल कर अपना दाम साफ कर रही है तो कोई दल जातिगत समीकरण समीकरण को पुष्ट करने के लिए दरबदर किए इन नेताओं को गले लगा रहा है। कुल मिलाकर अफरा-तफरी का माहौल है। दल बदल-बदलकर नेतागिरी करने में पारंगत नेता इस बार भी अपना राजनीतिक धर्म निभा रहे हैं। सियासी चौसर में किसकी शह और किसकी मात होगी। कहना मुश्किल है। हालांकि चुनावी विशेषज्ञ भी अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ा रहे हैं। हालांकि पिछली बार के उत्तरप्रदेश के चुनावी नतीजों ने सबका गणित बिगाड़कर रख दिया था। मुद्दों की राजनीति तो कब की गुम हो गई है सो दलबदलू नेताओं को किसी भी दल में ठौर ढूंढ़ने में कोई संकोच नहीं होता। जहां कहीं भी मौका मिले, बस लपक लो। वैसे भी दलबदलुओं की खोजी नजर पैदा हुई गुंजाइशों को फौरन ताड़ लेती है। उधर पार्टियां भी ऐसे बिन पैंदी के लोटाओं की तलाश में रहती हैं जिन्हें केवल नेतागिरी करनी है, किसी भी पार्टी का बैनर उठाने में कोई परहेज नहीं होता। हर बार की तरह इस बार भी कुछ ऐसे ही दलबदल चल रहा है। ताजा मामला बाबू सिंह कुशवाहा का है। बसपा से कई आरोपों के चलते निकाले गए कुशवाहा को भाजपा ने लपक लिया। भाजपा की मंशा तो उनके जरिए पिछड़ा वर्ग की राजनीति चमकाने की थी लेकिन दांव उलटा पड़ गया और उनकी दागदार छवि की वजह से हंगाम बरप गया। पार्टी में ही दो धड़े हो गए। इतना हल्ला मचा कि भाजपा को फिलहाल उनकी सदस्यता स्थगित करनी पड़ी। लेकिन बसपा से दरबदर किए गए बादशाह सिंह और दद्दन मिश्र भाजपा उम्मीदवार हैं। अवधेश वर्मा पंचायत चुनाव में काफी कुख्याति बटोर चुके हैं। अपने परिवार के लोगों को जिताने के लिए विरोधियों का अपहरण करवाने से भी नहीं चूके थे। गौर करने की बात है कि उस वक्त भाजपा ने इस पर खूब चीख-पुकार की थी। लेकिन अब हाथी की पीठ से उतरकर ये लोग कमल की छांव में आ गए हैं। मुख्तार अब्बास नकवी वैसे ही पार्टी को गंगा का दर्जा दे चुके हैं लिहाजा किसी भी दागदार दामन को वो अपने में समाहित करने में सक्षम है। अब बात करें समाजवादी पार्टी की तो भले ही उन्होंने डीपी यादव को अपनी पार्टी में न लिया और अपने प्रवक्ता मोहन सिंह को पार्टी से बर्खास्त कर दिया हो लेकिन फैजाबाद में शशि-कांड में लिप्त रहे सजा उम्रकैद की सजा काटने वाले आनंद सेन के पिता मित्रसेन यादव सपा के उम्मीदवार हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि पुत्र के आरोपों को यह कहते हुए खारिज किया जा सकता है कि अब बेटा नालायक निकल गया तो क्या करें? हमें तो मतलब उम्मीदवार से है लेकिन मित्रसेन भी कबूतरबाजी के मामले आरोपित रहे हैं। जेल के जिंगलों के पीछे सजा काट चुके सजा काट चुके भगवान शंकर शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित की यह सजा एक छात्र के अपहरण कर बलात्कार का मामले में मिली थी। ये भी सपा के उम्मीदवार हैं। हालांकि जब सपा, भाजपा, बसपा और कांग्रेस का दामन साफ नहीं है तो फिर आरएलडी की बिसाद ही क्या है। लेकिन जब चर्चा निकली है तो जिक्र तो होगा ही सिखों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले हाजी याकूब कुरैशी का आरएलडी ने खुली बाहों से स्वागत किया। कुरैशी ने पैगंबर का काटरून बनाने वाले काटरूनिस्ट का सिर कलम करने वाले के लिए इनाम की घोषणा की थी। इन्हें बसपा से निकाला गया था। पूर्व बसपा विधायक शाहनवाज राणा जिन पर लड़कियों की किडनैपिंग और छेड़छाड़ का मामला था उन्हें भी बसपा में शरण मिल गई। आरएलडी की महासचिव और पूर्व मंत्री अनुराधा चौधरी की पार्टी से नहीं निभी तो वो सपा में आ गई हैं।

मां की नाभिनाल से जुड़े हम

सुबह-सुबह उठो! अक्सर देर से ही उठ पाती हूं। रात को देर से जो सोती हूं। दिनचर्या बिल्कुल बर्बाद हो गई है। पढ़ती हूं, नौकरी करती हूं। खाना बनाती हूं। दोनों वक्त का न सही। खाने में कई बार मैगी, पोहा और ब्रेड होता है। कपड़े धुलती हूं। जब सारे गंदे हो जाते हैं। एक-एक कर धुलती हूं। मतलब वो सारा काम करती हूं जो मेरी मां मेरे लिए करती थी। लेकिन बेसलीका होकर। ठंड में घर से निकलती हूं, गरम कपड़े पहनकर। पर कोई पीछे से आकर मेरा मफलर मुङो जबरदस्ती नहीं थमाता।
जब से नौकरी करने आई हूं ऐसे ही दिन कट रहे हैं। अलसी के लड्डू हालांकि मां घर से बनाकर सर्दी शुरू होने से पहले ही भेज देती हैं, लेकिन वो डिब्बे में रखे-रखे ही फेंक दिए जाते हैं। उनका स्वाद मुङो नहीं जंचता। लेकिन मां तो हाथ में थमाती थी जबरदस्ती खिलाती थीं। और प्यार से बोलती थीं कि सर्दी बहुत है। अलसी गरम होती है। मेवे के लड्डू, शुद्ध देशी घी में बने भी भेजती हैं, उनका स्वाद जंचता है, पर दफ्तर की हड़बड़ में कभी-कभार ही इन्हें खाने का ध्यान आता है। फोन पर वो मुङो बार-बार कहती हैं कि बिटिया सर्दी बढ़ गई है। कान ढककर रहना। दफ्तर से जल्दी आ जाया करो। दो बादाम भिगो दिया करो और सुबह खा लिया करो। मैं झल्लाकर बोलती हूं कि इतना वक्त मेरे पास नहीं होता। और दफ्तर कोई मेरे चाचा का है जो ठंड लगे तो भाग आओ। वो बुरा नहीं मानतीं और अपनी गरज जताते हुए फिर मुझसे कहती हैं। अरे बिटिया तुम जब रात में खाना खाया करो तो उसी वक्त एक कटोरी में बादाम भिगो दो और जब चाय बनाने जाओ तो खा लिया करो। अब मैं पिघल जाती हूं और कहती हूं कि अच्छा ठीक है खा लूंगी। और फिर सोचती हूं कि मां तो बुजुर्ग हैं उनका ख्याल कौन रखता होगा। मैं दोबारा शाम को फोन करती हूं उनसे पूछती हूं आप बादाम खाती हो? लड्डू तो बनाए हैं न अपने और पापा के लिए। वो मेरी बात को अनसुना कर फिर से वही राग अलापती हैं, तुम घर नहीं पहुंची अभी तक? बिटिया छुट्टी लेकर आ जाओ, बहुत ठंडी है। मुङो पता है कि वो सारी हिदायतें जो मां मुङो देती हैं वो खुद नहीं मानतीं। आज जब मैं फौजिया अबू खालिद की कविता ‘नाभि नाल पढ़ रही हूं तो मुङो मेरी मां याद आ रही है, फौजिया कहती हैं मेरी मां ने रेगिस्तान से एक डोर खींची रेत की /और उसे नत्थी कर दिया मेरी नाभि से/चाहे जितनी दूर चली जाऊं मैं/उस बाल्टी की तरह होती हूं/जो बेमतलब ही कोशिश किए जा रही है/कुएं के गहरे पानी में झलकते चांद को उठाने की। कुछ ऐसा ही आज मुङो लग रहा है जब दूर उनसे परदेस में सालों से अपने स्वतंत्र अस्तित्व की तलाश में भटक रही हूं। बचपन में जो जिस नाभि नाल से मैं मां से जुड़ी थी।
जन्म लेते वक्त दायी ने उसे काट दिया था लेकिन हकीकत में वो नाल कोई काट नहीं सकता। या कि डरती हूं उस नाल के कटने से। दूर सही पर सुकून है मेरी मां तो है। उनके बूढ़े हाथ किसी भी बला से बचाने में मुङो सक्षम नजर आते हैं। जब मैं रोज की जद्दोजहद से तंग आ जाती हूं। उदास होकर उनसे अपनी थकान साझा करती हूं तो वो बेहद दृढ़ होकर मुझसे कहती हैं कि मुङो पता बिटिया तुम बहुत तरक्की करोगी। मेरा आशीष तुम्हारे साथ है। एक दिन तुम अपनी मंजिल जरूर पाओगी। मुङो भरोसा है और मेरी थकान छू-मंतर हो जाती है। मैं फिर जुट जाती हूं अपने काम में। मुङो खुद पर नहीं उनके भरोसे पर भरोसा होता है। कल रात मेरी दोस्त की मां का फोन आया था, मैं उससे तस्दीक की कि क्या तुम्हारी मां भी वही सब बोलती हैं जो मेरी मां कहती हैं। मुङो अचम्भा हुआ कि उसकी मां बिल्कुल मेरी मां जैसी ही हैं, उन्हें भी चिंता सताती है कि उनकी बेटी को ठंड न लग जाए, वो भी उसे बार-बार घर आने को कहती हैं, मफलर पहनने को कहती हैं। पर जब वो करीब होती हैं तो एहसास ही नहीं होता कि उनका होना कितना कीमती है। फिर उन बच्चों को देखती हूं जो कड़ाके की ठंड में नंगे पैर चौराहों और भीड़ भरी सड़कों के बीच कभी पोस्टर बेचते हैं तो कभी फूल। कभी थालियों में भगवान की तस्वीरें रखकर आधे-अधूरे कपड़े पहनकर भीख मांगते हैं। शुक्र है दूर ही सही पर मेरी मां तो है।

Thursday, January 5, 2012

एक और गंगा मगर सियासी!

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी राष्ट्रीय पुष्प की तुलना राष्ट्रीय नदी से कर गए। नकवी की जुबान फिसल गई या फिर उनका सामान्य ज्ञान कम पड़ गया! क्या हुआ? ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। नकवी ने अपनी पार्टी की पवित्रता का बखान करते हुए उसकी तुलना गंगा से कर दी। हुआ यूं कि बसपा के दागी मंत्रियों को पार्टी में शामिल करने पर भाजपा की कढ़ी आलोचना हुई। खुद पार्टी ही इस मुद्दे पर दो धड़ों में बंट गई पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली और सुषमा स्वाराज को नितिन गणकरी का यह फैसला नहीं भाया। बसपा के दरबदर किए गए मंत्रियों को भाजपा में शामिल करने को लेकर उठ रहे सवालों को शांत करने के लिए नकवी सामने आए और उन्होंने कहा, कमल दल (भाजपा) गंगा जैसी पवित्र पार्टी है, जिसमें तमाम नाले आकर गिरते हैं। मगर इससे गंगा को कोई फर्क नहीं पड़ता। बसपा से बाहर किए गए राष्ट्रीय ग्रामीण मंत्री बाबू लाल कुशवाह और श्रम मंत्री बादशाह सिंह भाजपा में शामिल हो गए। हो-हल्ला मचा कि भ्राष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली पार्टी ने भ्रष्टाचारियों को अपने दल में कैसे शामिल कर लिया। कहने वालों ने यहां तक कह डाला कि भाजपा के वरिष्ठ एवं वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी एक तरफ भ्रष्टाचार विरोधी यात्र कर रहे हैं और दूसरी तरफ भ्रष्टाचारियों को पार्टी में शामिल किया जा रहा है। बसपा के पूर्व बाबू लाल कुशवाहा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में घोटालों और बहुचर्चित सीएमओ हत्याकांड में कथित तौर पर लिप्त हैं। बादशाह सिंह की बात करें तो इन्हें लोकायुक्त की सिफारिश पर पद दलित किया गया। इन पर भी पद का दुरुपयोग करने और भ्रष्टाचार जैसे संगीन आरोप हैं। सीबीआई दोनों मामलों की जांच कर रही है। मायावती अपनी पार्टी के दागी मंत्रियों को दरकिनार करने में लगी हैं। इससे पहले भी कई और मंत्री निकाले जा चुके हैं। मायावती अपनी पार्टी को साफ करने में लगी हैं। इससे पहले भी चार मंत्री वन मंत्री फतेह बहादुर सिंह, प्राविधिक शिक्षा राज्य मंत्री सदल प्रसाद, अल्प संख्यक कल्याण एवं हज राज्य मंत्री अनीस अहमद खान उर्फ फूल बाबू और मुस्लिम वक्फ राज्य मंत्री शहजिल इस्लाम अंसारी को तत्काल प्रभाव से मंत्रिमंडल से निष्कासित किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री ने इन मंत्रियों को इस्तीफा देने का मौका भी नहीं दिया। अगर संसदीय प्रक्रिया के जानकारों की मानें तो किसी मंत्रिमंडल से निष्कासिक करने से पहले मुख्यमंत्री पहले मंत्रियों से इस्तीफा देने को कहते हैं, इसके बाद अगर मंत्री अड़े रहें तो उन्हें बर्खास्त किया जा सकता है। इतना ही नहीं एक अन्य राज्य मंत्री ददन प्रसाद ने मौके की नजाकत को समझते हुए खुद ही इस्तीफा दे दिया। बसपा प्रमुख विधान सभा चुनावों से पहले अपनी पार्टी की सफाई करने में जुटी हैं। लेकिन भाजपा को क्या हो गया कि बसपा के दर बदर किए दागी मंत्रियों को अपने दामन में समेटने में लगी है। नकवी ने शायद इसी पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए कहा होगा कि भाजपा गंगा है। जैसे गंगा में कई नाले आकर गिरते हैं लेकिन गंगा की पवित्रता ज्यों की त्यों बनीं रहती है। गंगा किसी में भेदभाव नहीं करती। लोग पाप धुलने के लिए गंगा की शरण में जाते हैं, वैसे ही भाजपा में आकर सब पवित्र हो जाएंगे। अब चाहें कुशवाहा हों या फिर बादशाह सिंह क्या फर्क। लेकिन नकवी साहब को कौन समझाए कि पापियों के पाप धुलते-धुलते राम की गंगा मैली हो गई है! दो दशक से भी ज्यादा समय से गंगा की सफाई में सरकारी खजाने के हजारों करोड़ खर्च हो चुके हैं। देश की राष्ट्रीय समस्याओं में गंगा की सफाई शीर्ष पर है। ऐसे में नकवी साहब कमल दल से गंगा की तुलना करने में अड़े हैं।

Monday, December 26, 2011

क्यों छाए ‘अन्ना’ और ‘कोलावेरी डी’

इस साल दो चीजों ने मुङो रोमांचित किया। पहला ‘अन्ना का आंदोलन’ तो दूसरा ‘कोलवेरी डी’। दोनों में में कुछ बातें जो बिल्कुल सामान्य थीं, भाषा और प्रस्तुतिकरण। आंदोलन भ्रष्टाचार जैसे गुस्सा दिलाने वाले चिरपरिचित मुद्दे को केंद्र में रखकर खड़ा किया गया तो गाने में कोलावेरी डी जैसे आक्रमक बोल का प्रयोग। दोनों नाकारात्मक शब्दों का प्रयोग धैर्य जैसे साकारात्मक भावना के साथ और बगैर किसी विकृत भावभंगिमा के किया गया। एक तरफ जहां अन्ना ने लोगों से संयम बरतते हुए अपना आंदोलन चलाने की बात कही तो दूसरी तरफ तमिल गाने का नायक धनुष भी बगैर गुस्साए अपनी प्रेमिका से नाराजगी की वजह पूछता है। मतलब संवाद की पहली कसौटी सुलझी हुई और जनसामान्य की समझ में आने वाली भाषा। दोनों ही इस कसौटी पर खरे उतरे। अब जिन चेहरों को दोनों में सामने लाया गया वे भी कोई खास तरह के नहीं थे। पांच फुट दो इंच के अन्ना, सफेद पोशाक और गांधी टोपी पहने जिन्हें देखकर आमजन को सहज ही भरोसा हो गया कि ये नेतागिरी करने और अपना चेहरा चमकाने नहीं बल्कि जनता को जगाने और हमारे दर्द को साझा करने आए हैं। उनके भाषण किसी कुशल लेखक से कलमबद्ध नहीं कराए गए। जब उन्होंने मराठी मिश्रित हिंदी में कहा ‘मुङो आप लोगों से ऊर्जा मिल रही है, आपके उत्साह से मुङो उत्साह मिल रहा है’..‘हो सकता है वो लोग मुङो उठा ले जाएं पर हिंसा मत करना’। शायद अन्ना ये न बोलते तो जैसी प्रतिक्रिया सरकार की तरफ से हो रही थी ऐसे में आंदोलन उग्र हो जाता। लोगों को समझ में आया कि अन्ना हमें केवल उकसाने नहीं आए हैं। अब कुछ ऐसा ही कोलावेरी डी के धनुष ने भी किया, लल्लनटॉप टाइप वेशभूषा धारण न करके एक आम प्रेमी की तरह वो दुखी होकर प्रेमिका से गुस्से की वजह पूछते हैं। सही बात तो यह है कि गाने में कोई राग भी नहीं। इस गाने की आलोचना करने वालों ने इसे बगैर सुर ताल का अलाप करार दिया। जैसे अन्ना के भाषण को सुगढ़ बनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया वैसे ही गाने में बस बोल को तवज्जो दी गई। चार सेकेंड के गाने में 34 बार कोलावेरी डी का प्रयोग किया गया। इस मुहिम में भी अन्ना और उनके सहयोगियों ने भी लगातार लोगों के मन में एक बात पुष्ट करने की कोशिश की कि अन्ना भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात कर रहे हैं। मैंने उस दौरान कई लोगों से जब इस बारे में पूछा तो उन्हें लोकपाल के बारे में कोई खास जानकारी नहीं थी, लेकिन उन्हें पता था कि अन्ना भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए अड़े हैं। इसलिए हम उनके साथ हैं। अब आखिर में बात करें इन दोनों के प्रचार की। तो निसंदेह दोनों की मार्केटिंग में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। मीडिया ने अन्ना को कवरेज दिया और दिल खोलकर दिया। या यों कहें कि मीडिया के पास उस वक्त उससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं था। उधर कोलावेरी डी पर भी मीडिया की इनायत रही। हिंदी और इंग्लिस मीडिया दोनों ने संपादकीय से लेकर अन्य लेख इस पर लिखे। फर्क नहीं पड़ता की आलोचनात्मक या फिर विश्लेषणात्मक। अन्ना और कोलावेरी डी की चर्चा इतनी हुई कि लोग इनका मतलब भले ना जाने या जानें भी, लोगों की जुबान पर यह शब्द इतना चढ़। चेतन-अवचेतन मन में एक छवि बन गई। दूसरी बात देश की पूरी जनसंख्या का एक तिहाई युवा है। जिसे आक्रामकता भाती है, जो जिद्दी लोगों को पसंद करता है। जो तब तक अड़ा रहता है जब तक कि उसे उसके सवाल का जवाब न मिल जाए। धनुष अपनी प्रेमिका से बार-बार पूछते हैं कि तुम आखिर इतनी नाराज क्यों हो? वाए दिस कोलावेरी डी? फिर बताते हैं कि उनकी प्रेमिका देखने में कैसी है, फिर अपना हाल-ए-दिल बयान करते हैं, लेकिन उनके जहन में बस एक ही बात और एक ही लक्ष्य है कि उनकी प्रेमिका इतना नाराजा क्यों है। कैसे उसकी नाराजगी का पता लगाएं। अन्ना भी अड़ियल हैं, जिद्दी हैं, वो बस एक बात पर अड़े हैं कि लोकपाल लाओ। दरअसल सफल संवाद के लिए सामने वाले के मनोविज्ञान को समझना बेहद जरूरी है। दोनों के पीछे की टीमों ने इसे बखूबी समझा। नयापन, रोमांच, दृढ़ता और लक्ष्य केंद्रित होना इनके लोकप्रिय होने की अहम वजह रहीं।

Tuesday, December 20, 2011

..फिर सब कुछ खुदरा हो जाएगा!

संध्या द्विवेदी
आलू, टमाटर, गोभी, अदरक, लहसुन, प्याज। सभी सब्जियां झोले में डालने के बाद मेरी मां हिसाब करतीं। ये लो दीदी, बावन रुपए। मेरी मां पचास का नोट निकालतीं। लो, दो रुपए और.. अरे भइया रोज तो तुम्हारे यहां से ही लेते हैं। और हां, थोड़ा धनिया और मिर्च डाल देना। वह भी जिद छोड़ देता। मुङो देखता छोटी बिटिया है का? हां. मेरी मां बताती कल आई है। हरिद्वार में पढ़ती है। बहुत दुबरा गई हो बिटिया। मैं बस मुस्करा देती। और बहुत दिन होइ गए बउवा नहीं आए। हां, काल आ जइहैं। अब पढ़ाई-लिखाई के मारे फुर्सत नहीं मिलती। वो सब्जी वाला मेरी सेहत को लेकर जितना चिंतित लगता, उतना ही मेरी पढ़ाई लिखाई को लेकर गर्वान्वित होता। मुङो भी वो दादा जी बेहद अच्छे लगते। वो सब्जी तौलते-तौलते मेरी मां से पूछते और बड़ी बिटिया के लिए लड़का मिला की नाहीं। मेरी मां लंबी सांस लेकर जवाब देतीं। हां, देख रहे हैं। अपनत्व से भरे दादा जी कहते दुबाइन जब समय अई तो पता ना लागी।
सब्जीवाले दादा जी मां को अपनत्व के साथ ऐसे समझाते जसे वो हमारे घर का हिस्सा हों। फिर सब्जी मंडी की दूसरी तरफ नमकीन-बिस्किट और चटर-पटर चीजों की दुकान पर मेरी मां पहुंचतीं। जब हम घर पहुंचते थे मेरी मां तभी नाश्ते की दुकान की तरफ रुख करती थीं। मैं चीजों को चखने और देखने में मशगूल हो जाती। उधर से आवाज आती, नमस्ते चाची। अरे बिटिया आई है। भइया ये वाली दे दो। मैं एक ड्राई फ्रूट से लबालब नमकीन उठाती, मम्मी ये एक पैकेट बउवा के लिए ले लो।
दरअसल, उस वक्त मेरा भाई बीटेक कर रहा था मैं एमए। वो लखनऊ में और मैं हरिद्वार में रहते थे। सामान तौलते-तौलते दुकानवाले भइया मुझसे पूछते बिटिया दुबरा बहुत गई हो। लेकिन पढ़-लिख लोगी तो जिंदगी संवर जाएगी। चाची आपके दोनों छोट बिटिया और बउवा बहुत होशियार हैं। और हां चाची एक लड़का है, उसकी कुंडली लेकर आपको दे देंगे। मां कृतज्ञता जाहिर करतीं-बस बड़ी बिटिया की शादी हुई जाए, बाकी इ दोनों तो हिल्ले लग जइहैं। आज भी वहां सब जस का तस है। मां आज भी मुफ्त में धनिया-मिर्च लेती हैं। हमेशा पूरा हिसाब करती हैं, मतलब 52 तो 50, लेकिन कभी 48 होने पर 50 नहीं देतीं। मैं एक ऐसे समाज की बात कर रही हूं जहां सब्जीवाले दादा जी से लेकर जूस वाले चचा तक, नमकीन वाले भइया से लेकर किराने वाले अंकल तक सब हमारे दुख-सुख के साझीदार हैं। आज सोचती हूं कि कहीं मेरे घर के आसपास भी कोई वॉलमार्ट पहुंच गई तो सबकुछ बदल जाएगा। क्योंकि वहां कोई दादा जी और भइया नहीं होंगे। खुदरा स्टोर आ जाएंगे तो सब खुदरा हो जाएगा, रिस्ते भी।

Tuesday, November 29, 2011

बहस ‘आजकल’ कुछ खट्टी कुछ मीठी



कल हमेशा बेहतरी का दावा करता है, आज अक्सर अपरिपक्व होने का आरोप ङोलता है। पीढ़ियों के बीच भी कुछ ऐसी ही बहस सदा से चलती आ रही है। मौजूदा जमात बुजुर्गो को हमेशा दकियानूसी और कम रफ्तार समझती है जबिक पुरानी पीढ़ी वर्तमान पीढ़ी की रफ्तार को बेलगाम मानती है। हम जो कर गुजरे तुम लोग तो कर ही नहीं सकते, पचास के दशक के सफेद दाढ़ी वाले बुजुर्ग ने अपने करीब खड़े युवाओं पर ताना मारा तो, मौजूदा पीढ़ी की नुमाइंदगी कर रहे युवाओं से बर्दाश्त नहीं हुआ। आप वो करके दिखाइये जो हम करते हैं। अब तो बड़े मियां जी को गुस्सा आ गया। तुम लोग कंप्यूटर पर काम करने को आधुनिक और विकसित होने की कसौटी समझते हो। हमारे साथ पैदल चलकर दिखाओ तो जानें, चुनौती भरे अंदाज में दादा जान ने अपने चारों ओर खड़े नवयुवकों पर नजर डालते हुए कहा। तपाक से जवाब मिला मैट्रो है कदम-कदम पर हम पैदल क्यों चलें? अजी तुम्हारे भीतर वो ताकत ही नहीं है। हमने तो ढाई-ढाई सौ ग्राम घी खाया और जमकर मेहनत की। लो जी हराम की तो हम भी नहीं खाते जी-जान से मेहनत करते हैं, 12-15 कभी-कभी 18-18 घंटे। हमारे जमाने में तहजीब थी तुम लोगों में तो..। कैसे कह सकते हैं हम बदतमीज हैं। हम अपने मां-बाप के पैर दबाते थे। उनके सामने बात करने से भी डरते थे। उनसे बहस नहीं..। तो हम भी अपने मां-बाप को प्यार करते हैं। हर त्यौहार में उनसे मिलने जाते हैं। उन्हें फोन करते हैं। उनके लिए उपहार भी ले जाते हैं। अब बताइये। लेकिन बहस करते हैं, जिद करते हैं..। क्योंकि जिद करो आगे बढ़ो। दैनिक भास्कर अखबार की पंचलाईन ठोंकते हुए एक युवक ने जवाब दिया। बड़े मियां को समझ नहीं आया। पूरा-पूरा दिन फोन पर लगे रहो..एसएमएस करते रहो। वक्त की बर्बादी। लो जी बगैर किसी से मिले फोन पर हाल-चाल ले लिया, दे दिया। इसमें बुराई क्या है। दादा मियां को और गुस्सा आया उन्होंने कहा बगैर सोचे समङो कुछ भी कर डालते हो तुम, डर नाम की कोई चीज नहीं। दूसरे युवक ने फिल्मी अंदाज में कहा अंकल..डर के आगे जीत है। अब तक एक आंटी भी फॉम में आ चुकी थीं। आज कल के बच्चे तो बीवी आई नहीं की मां को टाटा कह देते हैं। बीवी का हाथ पकड़ा और बस निकल लिए। पहले तो परिवारों के बीच में हम रहते थे। करीब खड़ी एक लड़की ने कहा..। कितना जुल्म होता था न आपका मन तो होता होगा कि आप अंकल के साथ रहें? हां पर, दुख और गुस्से से भरी आंटी ने अपनी सास को संबोधित करते हुए कहा माता राम की सेवा जो करनी थी। पूरी जिंदगी बर्बाद हो गई। और हम आपकी उम्र में आकर सासा को धिक्कारना नहीं चाहते और जिंदगी की बर्बादी पर अफसोस नहीं करना चाहते। एक टिप्पणी जो बस के किसी कोने में खड़ी एक मोहतरमा की टिप्पणी ने सब का ध्यान खींचा। दरअसल पीढ़ियों के बीच हमेशा रेस की मानसिकता बनीं रहती है। बुजुर्गो को मुख्य धारा से कटने का डर और युवकों को मुख्यधारा में बनें रहने की चिंता रहती है। जबकि दोनों ही चिंता फिजूल हैं। जड़ों से कट के पेड़ पनपता नहीं और ठूंठ किसी को रिझाता नहीं। पर यह आजकल के बीच यह बहस जारी है रहेगी और मैं तो कहती हूं रहनी भी चाहिए। क्योंकि यही बहस कम से कम मुङो मेरे पापा से और पापा को दादा से जोड़े रखती है। ये नोंकझोक भी जरूरी है। बहस में लगभग एंकर की भूमिका निभा रही एक लड़की जो आज की थी, उसने स्टॉप आने पर कल यानी दादा मियां को बाय किया। उसके इस संबोधन से गदगद दादा मियां ने आर्शीवाद भरे अंदाज में हाथ उठाया। तुम्हें यहीं उतरना है, क्या बेटा?

Tuesday, October 25, 2011

चराग तले अंधेरा क्यों?

छौना पत्रकार हूं, सो पत्रकारिता अभी सिर चढ़कर बोलती है। पिछले साल दीवाली को दफ्तर पहुंचते ही आदेश हुआ कि उत्तम नगर चले जाओ, वहां कुम्हारों की बस्ती है। दीपावली पर विशेष सामग्री इकट्ठी करनी है तुम्हें। उछलता-कूदता मैं पहुंच गया स्पॉट पर। कुछ पूरे कच्चे, कुछ आधे कच्चे घर। उन पर ढेर के ढेर मिट्टी के बने दीये, झूमर, लक्ष्मी, गणेश समेत कई अन्य सामान। देखकर जी खुश हो गया। दाम-वाम पूछे। साथ में फोटोग्राफर था। वो तो मानों इस नजारे को देखकर काबू में नहीं थे। कहीं कच्चे चूल्हों के पास बैठी महिलाएं को अपने कैमरे में कैद करते तो कहीं चाक पर घूमती उंगलियों को। नजारा भी अद्भुत था। कई महिलाएं और बच्चे गीली मिट्टी के ढेर को पैरों से रौंधने में लगे थे। माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रौंधे मोह..इस दृश्य को देखकर यही पंक्तियां याद आ रही थीं। अब बारी थी, कुछ प्रसिद्ध कुम्महार परिवारों से मिलने की। ग्रामीण परिदृश्य को देख प्रफुल्लित होने के बाद अब बारी चौैंकने की थी। कॉलोनी में कुछ ऐसे परिवार थे, जिनके हुनर को पूर्व राष्ट्रपतियों ने सराहा था। उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के सर्टिफिकेट भी मिले थे। लेकिन अब उनके आगे की पीढ़ी इस काम को अपनाना नहीं चाहती थी। इससे ज्यादा ताज्जुब तब हुआ जब परिवार के बुजुर्ग भी नई पीढ़ी के इन विचारों से सहमत थे। वो भी नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे इस काम में लगें। मैंने एक बुजुर्ग से पूछा अगर आप लोग ऐसा करेंगे तो धीरे-धीरे यह हुनर लुप्त हो जाएगा। इससे देश अपनी एक पारंपरिक विरासत से वंचित हो जाएगा। जी होता है तो हो। फिर आपको तो सर्टिफिकेट भी मिले हैं। सर्टिफिकेटों से पेट नहीं भरता। हुनर को सराहने से काम नहीं चलता। हमारा हुनर और मेहनत मिट्टी के भाव खरीदकर व्यवसायी चार गुना दामों में बेचते हैं। इन बच्चों को इस काम में डालकर उनके भविष्य को मिट्टी में नहीं मिलाना चाहते हैं। अब मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उस बुजुर्ग के चेहरे से हटकर मेरी नजर उन दीपकों पर जाकर टिक गई, जो खास दीपावली के लिए बनाए गए थे। कसीदाकारी किए दीये। तरह-तरह की आकृति। मैंने कुछ अपने लिए कुछ दोस्तों के लिए दीवाली की शुभकामनाएं देने के लिए बतौर उपहार देने की नियत से दीपक खरीद लिए। घर पहुंचा घर वालों औैर पड़ोसियों ने दीपकों को खूब सराहा। इन दीयों ने उजाला भी बिखेरा। जलते दीयों को देखकर मैं उस हुनरमंद कुम्हार की बातें याद कर रही थी और जब ये कुम्हार मर जाएगा तो दीपक कौन बनाएगा। सवाल उठ रहा था मन में आखिर चिराग तले अंधेरा क्यों?