Saturday, January 14, 2012
सर्दियों में चुनावी सरगरमी
मां की नाभिनाल से जुड़े हम
जब से नौकरी करने आई हूं ऐसे ही दिन कट रहे हैं। अलसी के लड्डू हालांकि मां घर से बनाकर सर्दी शुरू होने से पहले ही भेज देती हैं, लेकिन वो डिब्बे में रखे-रखे ही फेंक दिए जाते हैं। उनका स्वाद मुङो नहीं जंचता। लेकिन मां तो हाथ में थमाती थी जबरदस्ती खिलाती थीं। और प्यार से बोलती थीं कि सर्दी बहुत है। अलसी गरम होती है। मेवे के लड्डू, शुद्ध देशी घी में बने भी भेजती हैं, उनका स्वाद जंचता है, पर दफ्तर की हड़बड़ में कभी-कभार ही इन्हें खाने का ध्यान आता है। फोन पर वो मुङो बार-बार कहती हैं कि बिटिया सर्दी बढ़ गई है। कान ढककर रहना। दफ्तर से जल्दी आ जाया करो। दो बादाम भिगो दिया करो और सुबह खा लिया करो। मैं झल्लाकर बोलती हूं कि इतना वक्त मेरे पास नहीं होता। और दफ्तर कोई मेरे चाचा का है जो ठंड लगे तो भाग आओ। वो बुरा नहीं मानतीं और अपनी गरज जताते हुए फिर मुझसे कहती हैं। अरे बिटिया तुम जब रात में खाना खाया करो तो उसी वक्त एक कटोरी में बादाम भिगो दो और जब चाय बनाने जाओ तो खा लिया करो। अब मैं पिघल जाती हूं और कहती हूं कि अच्छा ठीक है खा लूंगी। और फिर सोचती हूं कि मां तो बुजुर्ग हैं उनका ख्याल कौन रखता होगा। मैं दोबारा शाम को फोन करती हूं उनसे पूछती हूं आप बादाम खाती हो? लड्डू तो बनाए हैं न अपने और पापा के लिए। वो मेरी बात को अनसुना कर फिर से वही राग अलापती हैं, तुम घर नहीं पहुंची अभी तक? बिटिया छुट्टी लेकर आ जाओ, बहुत ठंडी है। मुङो पता है कि वो सारी हिदायतें जो मां मुङो देती हैं वो खुद नहीं मानतीं। आज जब मैं फौजिया अबू खालिद की कविता ‘नाभि नाल पढ़ रही हूं तो मुङो मेरी मां याद आ रही है, फौजिया कहती हैं मेरी मां ने रेगिस्तान से एक डोर खींची रेत की /और उसे नत्थी कर दिया मेरी नाभि से/चाहे जितनी दूर चली जाऊं मैं/उस बाल्टी की तरह होती हूं/जो बेमतलब ही कोशिश किए जा रही है/कुएं के गहरे पानी में झलकते चांद को उठाने की। कुछ ऐसा ही आज मुङो लग रहा है जब दूर उनसे परदेस में सालों से अपने स्वतंत्र अस्तित्व की तलाश में भटक रही हूं। बचपन में जो जिस नाभि नाल से मैं मां से जुड़ी थी।
जन्म लेते वक्त दायी ने उसे काट दिया था लेकिन हकीकत में वो नाल कोई काट नहीं सकता। या कि डरती हूं उस नाल के कटने से। दूर सही पर सुकून है मेरी मां तो है। उनके बूढ़े हाथ किसी भी बला से बचाने में मुङो सक्षम नजर आते हैं। जब मैं रोज की जद्दोजहद से तंग आ जाती हूं। उदास होकर उनसे अपनी थकान साझा करती हूं तो वो बेहद दृढ़ होकर मुझसे कहती हैं कि मुङो पता बिटिया तुम बहुत तरक्की करोगी। मेरा आशीष तुम्हारे साथ है। एक दिन तुम अपनी मंजिल जरूर पाओगी। मुङो भरोसा है और मेरी थकान छू-मंतर हो जाती है। मैं फिर जुट जाती हूं अपने काम में। मुङो खुद पर नहीं उनके भरोसे पर भरोसा होता है। कल रात मेरी दोस्त की मां का फोन आया था, मैं उससे तस्दीक की कि क्या तुम्हारी मां भी वही सब बोलती हैं जो मेरी मां कहती हैं। मुङो अचम्भा हुआ कि उसकी मां बिल्कुल मेरी मां जैसी ही हैं, उन्हें भी चिंता सताती है कि उनकी बेटी को ठंड न लग जाए, वो भी उसे बार-बार घर आने को कहती हैं, मफलर पहनने को कहती हैं। पर जब वो करीब होती हैं तो एहसास ही नहीं होता कि उनका होना कितना कीमती है। फिर उन बच्चों को देखती हूं जो कड़ाके की ठंड में नंगे पैर चौराहों और भीड़ भरी सड़कों के बीच कभी पोस्टर बेचते हैं तो कभी फूल। कभी थालियों में भगवान की तस्वीरें रखकर आधे-अधूरे कपड़े पहनकर भीख मांगते हैं। शुक्र है दूर ही सही पर मेरी मां तो है।
Thursday, January 5, 2012
एक और गंगा मगर सियासी!
Monday, December 26, 2011
क्यों छाए ‘अन्ना’ और ‘कोलावेरी डी’
Tuesday, December 20, 2011
..फिर सब कुछ खुदरा हो जाएगा!
आलू, टमाटर, गोभी, अदरक, लहसुन, प्याज। सभी सब्जियां झोले में डालने के बाद मेरी मां हिसाब करतीं। ये लो दीदी, बावन रुपए। मेरी मां पचास का नोट निकालतीं। लो, दो रुपए और.. अरे भइया रोज तो तुम्हारे यहां से ही लेते हैं। और हां, थोड़ा धनिया और मिर्च डाल देना। वह भी जिद छोड़ देता। मुङो देखता छोटी बिटिया है का? हां. मेरी मां बताती कल आई है। हरिद्वार में पढ़ती है। बहुत दुबरा गई हो बिटिया। मैं बस मुस्करा देती। और बहुत दिन होइ गए बउवा नहीं आए। हां, काल आ जइहैं। अब पढ़ाई-लिखाई के मारे फुर्सत नहीं मिलती। वो सब्जी वाला मेरी सेहत को लेकर जितना चिंतित लगता, उतना ही मेरी पढ़ाई लिखाई को लेकर गर्वान्वित होता। मुङो भी वो दादा जी बेहद अच्छे लगते। वो सब्जी तौलते-तौलते मेरी मां से पूछते और बड़ी बिटिया के लिए लड़का मिला की नाहीं। मेरी मां लंबी सांस लेकर जवाब देतीं। हां, देख रहे हैं। अपनत्व से भरे दादा जी कहते दुबाइन जब समय अई तो पता ना लागी।
सब्जीवाले दादा जी मां को अपनत्व के साथ ऐसे समझाते जसे वो हमारे घर का हिस्सा हों। फिर सब्जी मंडी की दूसरी तरफ नमकीन-बिस्किट और चटर-पटर चीजों की दुकान पर मेरी मां पहुंचतीं। जब हम घर पहुंचते थे मेरी मां तभी नाश्ते की दुकान की तरफ रुख करती थीं। मैं चीजों को चखने और देखने में मशगूल हो जाती। उधर से आवाज आती, नमस्ते चाची। अरे बिटिया आई है। भइया ये वाली दे दो। मैं एक ड्राई फ्रूट से लबालब नमकीन उठाती, मम्मी ये एक पैकेट बउवा के लिए ले लो।
दरअसल, उस वक्त मेरा भाई बीटेक कर रहा था मैं एमए। वो लखनऊ में और मैं हरिद्वार में रहते थे। सामान तौलते-तौलते दुकानवाले भइया मुझसे पूछते बिटिया दुबरा बहुत गई हो। लेकिन पढ़-लिख लोगी तो जिंदगी संवर जाएगी। चाची आपके दोनों छोट बिटिया और बउवा बहुत होशियार हैं। और हां चाची एक लड़का है, उसकी कुंडली लेकर आपको दे देंगे। मां कृतज्ञता जाहिर करतीं-बस बड़ी बिटिया की शादी हुई जाए, बाकी इ दोनों तो हिल्ले लग जइहैं। आज भी वहां सब जस का तस है। मां आज भी मुफ्त में धनिया-मिर्च लेती हैं। हमेशा पूरा हिसाब करती हैं, मतलब 52 तो 50, लेकिन कभी 48 होने पर 50 नहीं देतीं। मैं एक ऐसे समाज की बात कर रही हूं जहां सब्जीवाले दादा जी से लेकर जूस वाले चचा तक, नमकीन वाले भइया से लेकर किराने वाले अंकल तक सब हमारे दुख-सुख के साझीदार हैं। आज सोचती हूं कि कहीं मेरे घर के आसपास भी कोई वॉलमार्ट पहुंच गई तो सबकुछ बदल जाएगा। क्योंकि वहां कोई दादा जी और भइया नहीं होंगे। खुदरा स्टोर आ जाएंगे तो सब खुदरा हो जाएगा, रिस्ते भी।
Tuesday, November 29, 2011
बहस ‘आजकल’ कुछ खट्टी कुछ मीठी
Tuesday, October 25, 2011
चराग तले अंधेरा क्यों?
छौना पत्रकार हूं, सो पत्रकारिता अभी सिर चढ़कर बोलती है। पिछले साल दीवाली को दफ्तर पहुंचते ही आदेश हुआ कि उत्तम नगर चले जाओ, वहां कुम्हारों की बस्ती है। दीपावली पर विशेष सामग्री इकट्ठी करनी है तुम्हें। उछलता-कूदता मैं पहुंच गया स्पॉट पर। कुछ पूरे कच्चे, कुछ आधे कच्चे घर। उन पर ढेर के ढेर मिट्टी के बने दीये, झूमर, लक्ष्मी, गणेश समेत कई अन्य सामान। देखकर जी खुश हो गया। दाम-वाम पूछे। साथ में फोटोग्राफर था। वो तो मानों इस नजारे को देखकर काबू में नहीं थे। कहीं कच्चे चूल्हों के पास बैठी महिलाएं को अपने कैमरे में कैद करते तो कहीं चाक पर घूमती उंगलियों को। नजारा भी अद्भुत था। कई महिलाएं और बच्चे गीली मिट्टी के ढेर को पैरों से रौंधने में लगे थे। माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रौंधे मोह..इस दृश्य को देखकर यही पंक्तियां याद आ रही थीं। अब बारी थी, कुछ प्रसिद्ध कुम्महार परिवारों से मिलने की। ग्रामीण परिदृश्य को देख प्रफुल्लित होने के बाद अब बारी चौैंकने की थी। कॉलोनी में कुछ ऐसे परिवार थे, जिनके हुनर को पूर्व राष्ट्रपतियों ने सराहा था। उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के सर्टिफिकेट भी मिले थे। लेकिन अब उनके आगे की पीढ़ी इस काम को अपनाना नहीं चाहती थी। इससे ज्यादा ताज्जुब तब हुआ जब परिवार के बुजुर्ग भी नई पीढ़ी के इन विचारों से सहमत थे। वो भी नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे इस काम में लगें। मैंने एक बुजुर्ग से पूछा अगर आप लोग ऐसा करेंगे तो धीरे-धीरे यह हुनर लुप्त हो जाएगा। इससे देश अपनी एक पारंपरिक विरासत से वंचित हो जाएगा। जी होता है तो हो। फिर आपको तो सर्टिफिकेट भी मिले हैं। सर्टिफिकेटों से पेट नहीं भरता। हुनर को सराहने से काम नहीं चलता। हमारा हुनर और मेहनत मिट्टी के भाव खरीदकर व्यवसायी चार गुना दामों में बेचते हैं। इन बच्चों को इस काम में डालकर उनके भविष्य को मिट्टी में नहीं मिलाना चाहते हैं। अब मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उस बुजुर्ग के चेहरे से हटकर मेरी नजर उन दीपकों पर जाकर टिक गई, जो खास दीपावली के लिए बनाए गए थे। कसीदाकारी किए दीये। तरह-तरह की आकृति। मैंने कुछ अपने लिए कुछ दोस्तों के लिए दीवाली की शुभकामनाएं देने के लिए बतौर उपहार देने की नियत से दीपक खरीद लिए। घर पहुंचा घर वालों औैर पड़ोसियों ने दीपकों को खूब सराहा। इन दीयों ने उजाला भी बिखेरा। जलते दीयों को देखकर मैं उस हुनरमंद कुम्हार की बातें याद कर रही थी और जब ये कुम्हार मर जाएगा तो दीपक कौन बनाएगा। सवाल उठ रहा था मन में आखिर चिराग तले अंधेरा क्यों?
